Friday, January 25, 2013

इक नुक्कड़ : सफ़दर हाशमी




डर गयी सरकार कि, कोई जा रहा है भूखों नंगों के बीच, उन्हें समझाने हक की बात कर रहा है नुक्कड़ ( street play )....कहीं बहक न जाये लोग, मांग न ले अपना हक...कहीं भूखे-नंगों को भी न हो जाये एहसास हक का....तो भेज दिए कुछ लाठी लिए तामीलदार, और हुक्मरानों के तामीलदार गुलामों ने सरे बाज़ार कर दिया क़त्ल 'सफ़दर हाशमी' का. गिर पड़ी एक लाश, और गिर पड़ा एक जूनून. हुक्मरान खुश, मूक तमाशा देखते सरकार बहादुर खुश.....क्यूंकि जो आवाज़ उठी थी गिरा दी गयी....एक पेड़ जो सींचने चला था कई लोग, उखाड़ दिया गया!
              मैं नहीं हूँ सैफ़्रोन, न ही हरा और न ही लाल....फिर भी सफ़दर हाशमी पर पड़ा हर डंडा मुझे उन सभी के सीने पे पड़ता लगता है, जो चाहते हैं कुछ बदलना, चाहते है मुल्क की सलामियत और जो चाहते हैं, कि समाज में हो सके समरसता. आ सके लोग एक ही दर्जे तक. सफ़दर हाशमी का क़त्ल, सफ़दर का नहीं, इरादों का क़त्ल था. कोशिशों का क़त्ल था. ये हार थी हुक्मरानों की.....
            सत्ता को शायद नहीं पता, कि इरादे मरते नहीं हैं हैं और ना ही राहनुमा भी. कोई न कोई फिर कहेगा 'हल्ला बोल'.

'मुल्क कि बर्बर सत्ता,
ऑंखें घुमा के देख लो,
 इक सफ़दर मरा था जहां,
बीसियों सफ़दर खड़े हैं.'


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सैफ़्रोन, हरा, लाल- क्रमश: हिन्दू, मुस्लिम, कम्युनिज्म प्रतीक.



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