Friday, December 21, 2012

.....खुदा कहीं गुम सा हो गया है!



                             
                                          "यार क्या पढ़ रहे हो?" वो पीछे से पूछती है...."इंडियन इकॉनमी"...."ह्म्म्म मुझे भी पढाओ."...मैं चुपचाप उसे पढ़ाने लगता हूँ. ये किताबों  से मम्मी ने बचपन में दोस्ती क्या कराई...अब लत सी हो गयी है. ऑफिस में खाली टाइम में कुछ न कुछ पढ़ता रहता हूँ. कभी इकॉनमी से वास्ता होता है तो कभी 'पाउलो काल्हो' से तो कभी 'हथकड़' बाले किशोर भाईसाब 'चौराहे पर सीढियां' लेकर पीछे पड़  जाते हैं. खैर, मैं शुरू हो जाता हूँ...."मैं पूछना चाहती हूँ...यार जब WTO ने तक रिव्यू दिया की हम 10 की 'ग्रोथ' कभी 'रीच' नही कर पाएंगे तो हमने ऐसा ऐम ही क्यों रखा? अवर PM इज़ एन इकोनॉमिस्ट ना?"....मैं कुछ नहीं बोलता हूँ........साल्ला फेंकने में क्या जाता है....सरकार कुछ भी फेंक दे...कौन सा सल्ला साफ़ पानी 65 साल में घर तक पहुंचा है जो सब कुछ उनके बोलने से ठीक होना है....वैसे भी आपका CV आपके समझदार होने की निशानी नहीं है.....कैम्ब्रिज, हॉवर्ड ने देश को बहुत से मुर्ख दिए हैं..... खैर उसे बहुत सी चीज़े समझ नहीं आती, कि क्यूँ  68% लोग 2 डॉलर से कम कमा रहे हैं फिर भी हमारी इकॉनमी इतनी तेजी से कैसे बढ़ रही है....40% बेरोजगारी है फिर भी हम कुछ कर क्यूँ नहीं रहे हैं.....और भी जाने क्या-क्या. वैसे समझ तो मुझे भी नहीं आया....और आप नार्मल हैं तो आप को भी नहीं आयेगा...कि देश किसके भरोसे चल रहा है.

                     वो 'ऑफिस कम्यूनिकेटर' पे चैट करता है....."यार तीन दिन से सो नहीं पा रहा हूँ.... दिमाग में वही देल्ही-रेप केस चल रहा ही....उस बंदी की क्या गलती थी....हमारी उम्र की ही है यार!''.....खुदा कहीं गुम सा हो गया है....ना तो हँसता है ना तो रोता है....'हैती' के लोगों के भूख से मरने से देल्ही में रेप तक उसे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता....जैसे साल्ला एक प्रोगाम हैंग हो के बैठ गया हो......"यार विव, तंग आ गया हूँ मैं, एक पॉएम लिखी है इस पे....सुनेगा? यार यहाँ बैठे बैठे तो मैं बस यही कर सकता हूँ."......मुझे 'रंग दे बसंती' के 'डायलाग' याद आते हैं.....'कॉलेज के इस तरफ तुम ज़िन्दगी नचाते हो, उस तरफ ज़िन्दगी तुम्हें......' कभी कभी हम कितना बेवस महसूस करते हैं...."एक इन्सान जानवर बन सकता है लेकिन 6 -6 लोग एक साथ जानवर कैसे बन जाते हैं...समझ नहीं आता." हमारी चैट पढ़ रही वो पीछे से बोलती है. मेरे पास जवाब नहीं है.

--***--


लगता है
जिस्म से रूह निकाल
भर दूं कुछ 'प्रोग्राम'.
कुछ इश्क,
कुछ आदमियत,
कुछ नियत.

ख़ुदा के 'प्रोग्राम' में
'वायरस' है कोई.
उम्र के साथ रूह
बेईमान बहुत हो जाती है!

                                   ~V!Vs


                   

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