Saturday, December 1, 2012

उन्नीदे तरकश से




नींद का हल्का सुरूर, 'द नोटबुक' मूवी और 'तेरा' नशा...बंद कमरे की ख़ामोशी रूमानियत लगती है. इश्क में पड़ा पड़ा जब ये दिल पिघलता है तो एहसास की बारिश करता है....जैसे वीरान सड़क पे पड़े सूखे पते मंजिलों पर उड़ रहे हों. हर पत्ता एक-एक याद है, जो खफा है सड़क से कि मंजिल तक क्यूँ नहीं जाती.
रात ढाई बजे ख़ामोशी से 'तेरा' आना वाजिब है...इन बिखरे पत्तों का भी, जिन्हें समेटने की अब शायद ज़रूरत नहीं.

ये कवितायेँ नहीं है...बस रूह से खरोंचे कुछ टुकड़े हैं. थोड़ी रूमानियत से भरे हैं, थोड़ी रूहानियत से.

--****--

अकेले कमरे में
बैठे बैठे भी याद नहीं आती.
जैसे कनस्तर को
ठक-ठकाने पर भी
कुछ नहीं निकलता हो.

कनस्तर खाली है.
रसोई में कुछ पकाने नहीं है.
तेरी याद भी नहीं!
तेरी भूख भी नहीं!


--***--

आज रिश्तों की
मरम्मत का मन नहीं है.
टूटे शीशे से अक्स बहुत दिखते हैं.
टूटे रिश्ते से अक्स बहुत दिखे,
तेरे भी,
मेरे भी.

इस दफा आत्म सम्मान बचा के रखूँगा.
इस दफा रिश्तों की
मरम्मत का मन नहीं है.

--***--


तू खफा होती रही
मैं रिश्ता रफू करता रहा.

अब वह चींदे बचे हैं,
रिश्ता नहीं.
हर चींदा गवाह है
हमारे उजड़ने का,
रिश्ता मरने का.

सोचता हूँ
रिश्ते उतार दूं.
मखौल उड़ाते हैं लोग
चिथड़े पहने देखकर.

--***--

खिड़कियाँ शोर करती हैं,
तेरी यादें अब अभी
वहीं से आती हैं.

सही से झांको कमरे में,
किसी को ओढ़े हूँ मैं.
यादों का अलाव की ज़रूरत नहीं है.

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