Saturday, October 6, 2012

सरहदें (टोबा टेक सिंह पर )



















देखो ये सरहदें,
अरे! हवाएं गुजर गयीं इनसे.
.....और ये पंछी,
इन्हें भी नहीं रोक पायीं ये.
लेकिन हमारा 'प्लेन' कभी
लाहौर नहीं उतर पाया.

बोतल में बंद कर कभी
पैगाम-ए-मोहब्बत फेंका था समंदर में,
सुना है रहीम मियां को
मिला है करांची में.
लेकिन मेरी नावें
कभी लंगर न डाल पायीं वहां!

कुछ पानी के कतरे
करांची से चलकर
मेरी सरजमीं पर नमक बन गये हैं!
हमारी नर्मदा भी
अरब में गिरती है.
करांची ने भी उसका पानी कभी
चखा ही होगा.

ना तुमने कभी चाहीं,
ना हमने कभी चाहीं,
फिर सरहदें क्यूँ बना दी?

अरे! ये बाघा बोर्डर तो हटाओ
वहां मेरा 'टोबा' मरा पड़ा है.
लगता है,
पागलों में वाइज़ से ज्यादा अक्ल है!
सब पागल ही हो जाएँ,
तो शायद सरहदें ना रहें.

                                   ~V!Vs

टोबा= टोबा टेक सिंह, सआदत हसन मिन्टो की बंटवारे पर लिखी बड़ी प्रसिद्द कहानी है, जिसका किरदार टोबाटेक सिंह (बिशन सिंह) पागल रहता है, और बाघा बोर्डर पर मर जाता है (उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिंदुस्तानथा, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान ; दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबाटेक सिंह पड़ा था.)
(read story here-
http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2005/05/050510_manto_tobateksingh.shtml (hindi)

http://www.sacw.net/partition/tobateksingh.html (english))

वाईज- उपदेशक
अरब- Arabian Sea

3 comments:

दीपक बाबा said...

ये बातें कितनी अच्छी है..

पर कागजों पर.

Vivek VK Jain said...

Kyuki humne kabhi kagaj par likhi batein Haqoqat banaane ki koshish nhi ki.

srujana said...

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