Friday, July 27, 2012

ज़िन्दगी



 नज़्म सी सुन्दर
चाय कि प्याली सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

अभी चुप चुप सी

अभी सयानी सी
पंख ले उडी
कोई कहानी सी.
थोड़ी थोड़ी मासूम,
थोड़ी दीवानी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

कभी सतरंगी हो बरसे,

कभी श्यामल ही हरसे,
दूर कही पोखर से
तारे चुन चुन निकाले.
सपने खुद ही बुन ले,
खुद ही उनको ढाले.
नाजुक है,
नजाकत से संवारी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

खुद का आसमां बुना,

खुद की ज़मीन चुनी.
शीशे में खुद ढला,
रूनी खुद ही धुनी.
लफ्ज़-लफ्ज़ में फिदरत,
अल्फ़-अल्फ़ अदा.
पतंगों से उड़ती,
मजिल चूमे सदा.
कभी आस, कभी प्यास,
कभी बेकरारी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

एक रात शबनमी

उस रात बहकी.
एक रात चुचाप
खुद ही सम्हली.
थामे सारे रिश्ते-नाते,
थामे कच्ची-पक्की बातें,
कच्चा सा फूल,
पक्के संस्कारों की क्यारी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

कभी थोड़ी थोड़ी खफा,

कभी लगे दुआ.
कभी जुदा जुदा,
कभी खुद खुदा.
बचपन की कहानी सी,
मीठी शैतानी सी,
कोई नादानी सी,
बेफिक्र जवानी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

भूलने की कवायत,

नया करने की तैयारी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

4 comments:

expression said...

सुन्दर....
एक रात शबनमी
उस रात बहकी.
एक रात चुचाप
खुद ही सम्हली.
बहुत सुन्दर नज़्म....

लाजवाब विवेक जी.

अनु

सतीश सक्सेना said...

एक बढ़िया रचना के लिए बधाई विवेक जी !

Anupama Tripathi said...

पक्के संस्कारों की क्यारी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

बहुत सुंदर लिखा है ...!!
शुभकामनायें...!!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुन्दर ज़िन्दगी यूँ प्यारी सी लगे

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