Tuesday, June 26, 2012

हर रोज


                 




                          हर रात तू मुझमें जवां होती है, हर रात मैं  जिबह होता हूँ....तेरी जंजीरों में बंधा उलझन में जीता हूँ जैसे जीना भी एक येसी सज़ा है जो हर रात बढेगी, हर दिन उगेगी! एक सुबह काश! दिन ना उगे मेरा.....स्याह होते लफ़्ज़ों कि तरह, मैं भी मुकम्मल याद बन जाऊं. तल्खियों कि सजा यही तो होती है!


हर रोज़


हर रोज़
आखिरी नज़्म की तरह
लिखता हूँ तुझको!

हर रोज़
शाम से माँगता हूँ,
कि रात तेरी याद में ना कटे!

हर रोज़
जाता हूँ तुझसे दूर!
इतने कोस कि,
मुड़के इरादों में भी 
न छू सके तुझे.

हर रोज़
ख़त्म करता हूँ तुझे
जिस्म से, जेहन से,
लफ्जों-लुआब से.

दुश्बारी ये है,
यह हर रोज़ ही होता है.
.....और तू माहरू बन
आ जाती है हर रोज़.

                          
                          ~V!Vs***

3 comments:

Mona said...

acchi rachna hai

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुंदर अभिव्यक्ति

दीपक बाबा said...

वाह ...


सुंदर कविता.

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