Wednesday, January 6, 2010


इंतज़ार 
मैं इंतज़ार में,
पात सा
हरे  से पीत हो गया,
और अब
श्यामल पड़,
डाल से टूट बिखर गया.
अस्तित्वहीन रह गया.
काश! तुम,
बादल सा बरसते,
सींचते,
तो हम भी हरे होते.
नहीं मरे होते.

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