Thursday, December 8, 2016

मणिपुर की बेटी के लिए

Irom Sharmila and Siroi Lily

तुम्हारी आग को राख में नहीं बदल सके
आखिर अफ्सपा को विदाई देनी ही पड़ेगी.

तुम साहस और इच्छाशक्ति में 
नमक सत्याग्रह की याद दिला देती हो.

बदन में तुम्हारे नली रही,
अफ़सोस, दो चार मैडल टांगता कोई.

तुम उम्मीद का सफ़ेद सिरोई लिली हो
जिसपे मुल्क की सरकार को फक्र होगा,
जिसके ही ख़िलाफ़ तुम खड़ी थीं.

जैसे कि ब्रिटिश संसद में 
गाँधी-मूर्ति शौभायमान है.


*अफ्सपा - AFSPA Armed Forces (Special Powers) Act
*सिरोई लिली- मणिपुर का राज्यीय पुष्प (स्टेट फ्लावर)

Friday, December 2, 2016

'पेंगोंग सो' से

Pangong Tso lake


बस एक तिहाई मेरी रही
दो तिहाई छीनी गई.
इश्क़ में भारत की रही
अपहृत हो चीनी गई.

तुम्हारे दो तिहाई हिस्से को
एक तिहाई हिस्से की
याद नहीं आती?

मेरे और पड़ोसी के आँगन
को बांटती दीवार
अक्सर बारिश में रो देती है.

उसके दोनों ओर के अग्रभाग 
कभी मिल नहीं पाते.

हालाँकि दोनों ओर को नीला पोता गया है
तुम्हारे पानी जैसा!


*पेंगोंग सो- लद्दाख में एक झील जो एक तिहाई भारत में है और दो तिहाई चीन अधिकृत भारत के हिस्से 'अक्साई चीन' में.

उम्र 25 में बुद्ध



तुम बुद्ध की उम्र तक 
पहुँचते-पहुँचते वैरागी होने वाले हो.
अफ़सोस! मेरे अंदर लौ  उत्पन्न न हुई.

मैंने अपना वक़्त अप्राप्य प्रेम में लगाया,
शुक्र है तुमने खुद को मांजने में.

तुम्हें बुद्ध वहां पहाड़ों में नहीं मिलना था,
न मिला होगा, न मिलेगा.

तुम बुद्ध हो,
अन्तर्निहित बुद्ध है.

Thursday, December 1, 2016

खरदुंग-ला पर राम सिंह

Khardungla. We haven't clicked Ramsingh for various reasons.  

लगभग बीस हज़ार फ़ीट
जहाँ मैं पच्चीस से ज्यादा मिनट साँस नहीं ले पाया

दो प्याले चाय और दो मैग्गी
खाने के बाद पता चला
कि 'हवलदार राम सिंह' हो तुम
भारतीय थलसेना से.

जितनी श्रद्धा से
मेरा मन भरा था,
वो किसी मंदिर में मेरे अंदर
आजतक नहीं उमड़ी.

*खरदुंग-ला - दुनिया का सबसे ऊँचा मोटरेबल रोड. ऊंचाई लगभग बीस हज़ार फुट (Exact 18380 Feet)

लेह की डोलमा की बेटी के नाम

Dolma's 2.5 yrs old Daughter



इन गर्मियों में तुम्हें
सालभर की रोटी के लिए
आना होगा 'पेंगोंग सो'
...और इन्हीं मुश्किल छह: महीनों को 
खुलते हैं तुम्हारे स्कूल.

तुम क्या करोगी?

उम्मीद मत छोड़ना,
तुम पढ़ना.
लेकिन तुम्हारी किताबों में लिखा है
'हिमालय तुम्हारे उत्तर में है.'
तुम्हारी किताबों में लिखी है
मुग़ल सल्तनत, अंग्रेजी हुकूमत.
तुम्हारा इतिहास ये नहीं है.

तुमसे एक बात कहता हूँ,
सरकारी किताबों में लिखी
हर बात सही नहीं होती,
और सरकारी वादे तो 
यकीनन सही नहीं होते.

तुम पढ़ना,
अच्छे-बुरे या कठोर हालातों में भी.

तुम्हें बस
'डोलमा की बेटी' की तरह ना जानें लोग,
तुम्हारा नाम अंकित  हो
अशोक चक्र की चौबीस में से
किसी एक तीली की जगह!

Wednesday, November 30, 2016

जीवंत-बुत


...और मैंने उनके कन्धों पर रख
बंदूकें चलाईं.

वो कंध  इतने दृण थे की
दशकों से वहां पर लाइन में
जीवंत-बुतों की तरह खड़े थे,
कपट-राजनीति की तरफ मुंह किये.

इंतज़ार में कि
कोई आएगा, इन कन्धों पे रख
बारूद चलाएगा,
छिन्न-भिन्न करेगा अराजकता, अलोकतंत्र.

जनाक्रोश के लिए तैयार खड़े ये कंधे
महान कवियों के कंधे हैं.

तुम चाहो तो इन्हें
ढाल बना सकते हो,
कंधे से बन्दूक चला सकते हो
या इन जीवंत-बुतों की उँगलियाँ थाम
राह पा सकते हो.

Tuesday, November 22, 2016

दक्षिण चीन सागर पर क्यों है घमासान | अनीता वर्मा

वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिप्रेक्ष्य में दक्षिण चीन सागर की अवस्थिति के कारण सामरिक, आर्थिक व खाद्य सुरक्षा आदि की दृष्टि से इसकामहत्त्व जाहिर है। उपर्युक्त कारणों से दक्षिण चीन सागर की अहमियत इसके तटीय देशों के बीच संघर्ष का सबब भी समय-समय पर बनती रही है। साथ ही दक्षिण चीन सागरके मद््देनजर इस क्षेत्र में महाशक्तियों का हस्तक्षेप भी होता रहा है। इस संदर्भ में दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा अवैध कृत्रिम द्वीपों का निर्माण व ओबामा द्वारा चीन को चेतावनी देना महाशक्तियों के हस्तक्षेप को ही प्रदर्शित करता है। उल्लेखनीय है कि 12 जुलाई 2016 को हेग स्थित संयुक्त राष्ट्र न्यायाधिकरण ने दक्षिण चीन सागर पर चीन के एकाधिकार के दावे को खारिज कर दिया। पांच सदस्यीय न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि चीन के पास ‘नाइन डैश लाइन’ के भीतर पड़ने वाले समुद्री इलाकों पर ऐतिहासिक अधिकार जताने का कोई कानूनी आधार नहीं है। ‘नाइन डैश लाइन’ द्वारा चीन ने दक्षिण चीन सागर के काफी हिस्से को अपने दायरे में लेने की घोषणा की थी, जिसमें कई छोटे-बड़े द्वीप भी शामिल हैं। ऐसी स्थिति में चीन की आक्रामकता ने न केवल विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों का अतिक्रमण किया बल्कि ताइवान, फिलीपींस, मलेशिया, विएतनाम जैसे तमाम तटीय देशों के लिए खतरा पैदा किया, जिनके द्वीप इन क्षेत्रों में हैं। अब हालत ऐसे हो गए कि समुद्र व आकाश में आवागमन के लिए चीन की इजाजत आवश्यक हो गई। चीन की मनमानियों से प्रभावित देशों ने विरोध किया और फिलीपींस ने अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण से हस्तक्षेप की मांग की।
इसी संदर्भ में न्यायाधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि चीन द्वारा दक्षिण चीन सागर में द्वीप बना कर समुद्र संबंधी संयुक्त राष्ट्र के नियमों (यूनाइटेड नेशंस कन्वेशन ऑन द लॉ ऑफ सी) का उल्लंघन किया गया है। उल्लेखनीय है कि चीन द्वारा दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप बनाने से कोरल रीफ को खतरा है। अनुमान के अनुसार 162 वर्ग किलोमीटर कोरल रीफ नष्ट हो चुका है जो समुद्री पर्यावरण की दृष्टि से काफी गंभीर नुकसान है। चीन ने न्यायाधिकरण के फैसले को मानने से इनकार कर दिया है। यही नहीं, उसने यह भी कहा कि वह न्यायाधिकरण को शुरू से अवैध मानता है। 1970 के दशक से शुरू होकर 1980 के दशक के मध्य तक विवाद काफी फैल गया, क्योंकि दक्षिण चीन सागर के संघर्ष में तेल एक कारक के रूप में उभर कर आया। तेल मिलने की संभावना के कारण दक्षिण चीन सागर के द्वीपों को लेकर तटीय देशों के बीच संप्रभुता के दावे की होड़ मच गई। इसी संदर्भ में ‘स्प्रातली द्वीप’ विवाद देखा जा सकता है। 1982 में 200 नाटिकल (समुद्री) मील का विशेष आर्थिक क्षेत्र संयुक्त राष्ट्र के समुद्री कानून का एक भाग बना और इस कानून पर हस्ताक्षर भी इसी वर्ष किए गए।
विएतनाम, ताइवान, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रूनेई जैसे तमाम तटीय देश ऊर्जा, मत्स्य, प्राकृतिक गैस, सुरक्षा आदि के लिए दक्षिण चीन सागर पर निर्भर हैं। ऐसे में दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा कृत्रिम द्वीप बनाया जाना चिंता का विषय है। इसी संदर्भ में 7 सितंबर 2016 को आसियान व पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में फिलीपींस ने अपने दावे की पुष्टि के लिए कुछ तस्वीरें जारी कीं। इन तस्वीरों से स्पष्ट होता है कि चीनी जहाज ‘स्कारबोरो शोआल’ कृत्रिम द्वीप के निर्माण में जुड़े हैं। हालांकि फिलीपींस पहले भी इस तथ्य को उठाता रहा है, लेकिन चीन इनकार करता रहा है। इसलिए फिलीपींस ने चीन द्वारा कृत्रिम द्वीप बनाए जाने की तस्वीरें तब जारी कीं जब चौदहवें आसियान शिखर सम्मेलन व ग्यारहवें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में आसियान के सदस्यों के साथ-साथ अन्य साझेदार जैसे अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया आदि के राष्ट्राध्यक्ष सम्मेलन में मौजूद थे।
दक्षिण चीन सागर की महत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह वैश्विक व्यापार के लिए एक बहुत महत्त्वपूर्ण मार्ग है। साथ ही यह प्राकृतिक संपदा से संपन्न है। दक्षिण चीन सागर वह बिंदु है जो हिंद महासागर व प्रशांत महासागर को मलक्का जल संधि के माध्यम से जोड़ता है। भारत के संदर्भ में देखें तो भारत का पचपन फीसद व्यापार इसी मार्ग द्वारा होता है। तटीय देश विएतनाम ने एक सौ अट्ठाईस तेल ब्लॉक भारत को दिए हैं जो दक्षिण चीन सागर में हैं। साथ ही अमेरिका भी इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए फिलीपींस के इलाके में नियमित सैन्य अभ्यास करता है जो ‘स्कारबोरो’ से लगभग दो सौ तीस किलोमीटर दूर है। भारत भी आसियान के सदस्य देशों के साथ सैन्य अभ्यास करता रहा है।
तेल की खोज की संभावना और समुद्र के नए कानून से महाद्वीपीय शैल्फ के क्षेत्रों पर दावे व समुद्री चट्टानों और द्वीप समूहों पर कब्जा करने की प्रवृत्ति को बल मिला। तेल की संभावना की खोज से प्रभावित होकर फिलीपींस ने कालायान (स्प्रातली के पूर्वोत्तर भाग) को अपना हिस्सा घोषित किया और 1974 में रीड के किनारे पांच द्वीपिकाओं पर कब्जा कर लिया। वर्ष 1995 में चीन ने फिलीपींस से ‘मिसचीफ भित्ती’ को छीन लिया। स्प्रातली के पश्चिमी क्षेत्र में दक्षिणी विएतनाम ने अमेरिकी कंपनियों से तेल दोहन के लिए समझौते किए और स्प्रातली को दक्षिण विएतनाम के प्रांत के प्रशासन के अंतर्गत लाने की खातिर कदम उठाए गए। वर्ष 1988 में चीन व विएतनाम के मध्य स्प्रातली द्वीप को लेकर संघर्ष हुए जिसमें साठ से ज्यादा विएतनामी नौसैनिक मारे गए। इसके अतिरिक्त मलेशिया ‘स्प्रातली द्वीप’ के दक्षिणी भाग पर दावा करता है। मलेशिया के मामले में चीन नाइन डैश लाइन को अस्वीकार करता है, जहां तेल का खनन कर रहा था।
दक्षिण चीन सागर में अपनी संप्रभुता के दावे के अतिरिक्त चीन ने वैधानिक व सैनिक रूप से भी अपनी स्थिति को आगे बढ़ाया। चीन ने दक्षिण चीन सागर के अपने बेड़े को आधुनिक बनाया है और पराकेल समूह के ‘वुडी द्वीप’ में अपना हवाई अड््डा बनाया है। दक्षिण चीन सागर में मत्स्य भंडार को लेकर भी एक भयावह घटना सन 2000 में देखी गई। चीन द्वारा गैर-कानूनी ढंग से मछली पकड़ने को रोकने के लिए फिलीपींस की गश्ती नावों ने चीनी पोतों पर हमला कर एक कप्तान को मार गिराया। इसी के फलस्वरूप मत्स्य विवाद भी सामने आया। दक्षिण चीन सागर को इस क्षेत्र की अधिकतर सरकारें मत्स्य उद्योग के पर्याप्त आधार के रूप में देख रही हैं। यहां मत्स्य भंडार समाप्त होने पर खाद्य व पर्यावरण सुरक्षा की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है। दक्षिण चीन सागर में तटवर्ती देश मछली आखेट पर न केवल खाद्य सुरक्षा के लिए निर्भर हैं, बल्कि यह उनकी आय का भी महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
इसी क्रम में दक्षिण चीन सागर के संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने चीन को चेताया कि अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण का फैसला मानने को वह बाध्य है, जब फिलीपींस ने अपने दावे के समर्थन में ‘स्कारबोरो शोआल’ में कृत्रिम द्वीप बनाए जाने की तस्वीरें जारी कीं। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि दक्षिण चीन सागर में आवागमन के समुद्री लेन वैश्विक व्यापार के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण मार्ग हैं। वैश्विक समुद्री कानून के आधार पर भारत ने नौवहन स्वतंत्रता की वकालत की। प्रधानमंत्री ने कहा, चीन को अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना चाहिए जिससे क्षेत्र में शांति, स्थिरता व समृद्धि बनी रहे। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत समुद्री संसाधनों के संरक्षण, पर्यावरण क्षरण के रोकथाम और समुद्र की आर्थिक संभावनाओं के दोहन के लिए अपने अनुभव साझा कर सकता है। भारत इसी साल (2016) ‘समुद्री सुरक्षा एवं सहयोग’ पर दूसरे ‘ईएस’ का आयोजन करेगा।
दक्षिण चीन सागर अपनी भौगोलिक अवस्थिति के कारण विश्व का महत्त्वपूर्ण व्यापार मार्ग है। इसके तटवर्ती देश प्राकृतिक तेल, गैस, मत्स्य, सुरक्षा आदि के लिए इस पर निर्भर हैं। ऐसे में यदि चीन अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण के फैसले की अवहेलना करता है तो इसके फलस्वरूप टकराव की नौबत आ सकती है, क्योंकि क्षेत्रीय शक्तियां अपने अधिकार जताना नहीं छोड़ेंगी, वे वर्चस्व स्थापित करने की होड़ में भी पड़ सकती हैं। दक्षिण चीन सागर पर वर्चस्व स्थापित करने की होड़ केवल चीन, विएतनाम, इंडोनेशिया, फिलीपींस, मलेशिया, ताइवान व ब्रुनेई के बीच नहीं रह गई है; अब अपने सामरिक व आर्थिक हितों की खातिर इसमें कई नए अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी भी शामिल होंगे और ऐसी स्थिति में अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न होगी जो दीर्घकाल तक सामरिक, आर्थिक, व्यापारिक समीकरणों तथा खाद्य सुरक्षा व पर्यावरण को प्रभावित करेगी।
इसी क्रम में शांति, स्थिरता व समृद्धि बनाए रखने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने चीन को चेताया कि अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण का फैसला बाध्यकारी है। भारत ने भी 1982 की संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि के तहत दक्षिण चीन सागर में नौवहन की स्वतंत्रता का समर्थन किया क्योंकि यह कानून अबाधित रूप से व्यापार की स्वतंत्रता भी प्रदान करता है। वस्तुत: चीन पूर्व एशिया में राजनीतिक, आर्थिक व सामरिक रूप से काफी सशक्त है। लेकिन दक्षिण चीन सागर पर वर्चस्व स्थापित करने की उसकी आक्रामक नीति ने सारे तटीय देशों को एकजुट होने के लिए प्रेरित किया। नतीजतन, इन तटीय देशों ने सुरक्षा के मद््देनजर अपने यहां नौसैनिक अड्डे स्थापित कर लिए, साथ ही अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों (भारत, जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस) के एकजुट होने का मार्ग भी, उनके सामरिक व आर्थिक हितों के कारण, प्रशस्त कर दिया।

जल परिवहन : जल मार्ग बनेंगे जीवन रेखा | जयंतीलाल भंडारी

यकीनन प्राकृतिक पथ कहे जाने वाले जलमार्ग कभी भारतीय परिवहन की जीवन रेखा हुआ करते थे.
लेकिन समय के साथ आए बदलाव और परिवहन के आधुनिक साधनों के चलते बीती सदी में भारत में जल परिवहन क्षेत्र उपेक्षित होता चला गया. लेकिन अब केंद्र सरकार आंतरिक जल परिवहन के विकास के लिए एक के बाद एक नए कदम उठाती दिख रही है. कुल घरेलू परिवहन में जल परिवहन का जो हिस्सा वर्तमान में महज 3.6 फीसद है, इसे वर्ष 2018 तक बढ़ाकर सात फीसद करने का लक्ष्य रखा गया है.
राष्ट्रीय जल मार्ग कानून के तहत 111 नए नदी मार्गों को राष्ट्रीय जल मार्गों के रूप में विकसित किए जाने की योजना है. यह सरकार की उस बड़ी योजना का हिस्सा है जिसके तहत जल मार्ग आगे चलकर  एक पूरक, कम लागत वाला और पर्यावरण के अनुकूल माल एवं यात्री परिवहन का माध्यम बन सकते हैं. साथ ही भारी दबाव से जूझ रहे सड़क और रेल परिवहन तंत्र को काफी राहत मिल सकती है.
सरकार ने राष्ट्रीय जल मार्गों को संविधान की सातवीं अनुसूची की केंद्रीय सूची में शामिल किया है. अनुसूची के तहत केंद्र सरकार अंतर्देशीय जलमार्गों में नौवहन और आवागमन संबंधी कानून बना सकती है. इससे राष्ट्रीय जल मार्गों पर राज्यों के बीच विवाद की गुंजाइश नहीं होगी. सरकार एक एकीकृत राष्ट्रीय जलमार्ग परिवहन ग्रिड की स्थापना की दिशा में भी बढ़ रही है. इसके तहत 4503 किमी जलमार्गों के विकास की योजना है.
इसी तरह राष्ट्रीय जलमार्ग क्रमांक एक के तहत मालवाहक जलपोतों को वाराणसी से कोलकाता ले जाने का परीक्षण चल रहा है.  हालांकि भारत के पास 14,500 किमी. जलमार्ग है. इस विशाल जल मार्ग पर सदानीरा नदियों, झीलों और बैकवाटर्स का उपहार भी मिला हुआ है, लेकिन हम इसका उपयोग नहीं कर सके. वस्तुत: भारत के अंतर्देशीय जलमार्गों में से करीब 5,200 किमी. नदियां और 485 किमी. नहरें ऐसी हैं, जिन पर यांत्रिक जलयान चल सकते हैं.
जमीनी हकीकत यह है कि केरल, असम, गोवा और प. बंगाल के कुछ हिस्सों तक ही जलमार्ग लोगों की जीवनरेखा बने रह सके हैं. घोषित राष्ट्रीय जल मार्गों में से केवल तीन ही सक्रिय हो सके हैं. पहले क्रम पर राष्ट्रीय जलमार्ग क्रमांक एक है. 1986 में स्वीकृत इस जलमार्ग के तहत गंगा-भागीरथी-हुगली नदी प्रणाली का 1,620 किमी. क्षेत्रफल शामिल है. दूसरे क्रम पर 1988 में स्वीकृत राष्ट्रीय जलमार्ग क्रमांक दो है. इसके तहत ब्रह्मपुत्र-सादिया से धुबरी तक का 891 किमी. क्षेत्र शामिल है. तीसरे क्रम पर राष्ट्रीय जलमार्ग क्रमांक तीन है. 1993 में स्वीकृत इस जल मार्ग पर केरल का 205 किमी. जलमार्ग है.
उल्लेखनीय है कि अंतर्देशीय जल परिवहन के विकास के लिए दुनिया के कई देशों में विशेष संगठन सक्रिय हैं. भारत ने भी अक्टूबर, 1986 में भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण की स्थापना की. लेकिन संगठन के तौर पर यह बहुत सफल नहीं रहा. कारण, इसके गठन के बाद से इसे बहुत कम धनराशि मिल सकी. निस्संदेह देश में जल परिवहन के तहत यात्री एवं माल ढुलाई संबंधी जरूरतों की पूर्ति के लिए बहुत संभावनाएं हैं. देश के अधिकांश बिजलीघर कोयले की कमी से घिरे रहते हैं. सड़क और रेल से समय पर कोयला नहीं पहुंच पाता. ऐसे में जलमार्गों द्वारा कोयला ढुलाई की नियमित व किफायती संभावनाएं हैं. हमारी कई बड़ी विकास परियोजनाएं जलमार्गों के नजदीक साकार होने जा रही हैं.
बहुत से नए कारखाने और पनबिजली इकाइयां इन इलाकों में खुल चुकी हैं. इनके निर्माण में भारी-भरकम मशीनरी की सड़क से ढुलाई आसान काम नहीं है. अनाज और उर्वरकों की ढुलाई भी जल परिवहन से संभव है. चूंकि विभिन्न राज्यों में बड़ी नदियों और उनकी कई सहायक नदियों के किनारे बहुत कुछ अनूठी सांस्कृतिक गतिविधियां तथा मेले और पर्व होते हैं. असम, प. बंगाल, केरल और गोवा स्थित काफी इलाकों में पर्यटकों की बड़ी संख्या में आवाजाही होती है. ऐसे में नदी क्षेत्रों के माध्यम से पर्यटकों की गतिशीलता बढ़ाई जा सकती है.
अंतर्देशीय जल परिवहन के विकास से बंदरगाहों और तटीय जहाजरानी क्षेत्रों को भी जोड़ा जा सकता है. इससे हमारी कई नदी प्रणालियों को लाभ होगा. अब देश में नदियों की प्रकृति और उनके गहरे उथले पानी, गाद को निरंतर बहाव के अलावा जगह-जगह बने पीपा पुलों तथा अन्य पुलों की समस्या पर भी ध्यान दिया जाना होगा. वाणिज्यिक नौवहन की व्यावहार्यता के लिए पर्याप्त दोतरफा जिंस और यात्री उपलब्धता पर भी ध्यान देना होगा. सरकार ने अगले पांच वर्ष में जलमार्गों के विकास के लिए 50 हजार करोड़ रुपये खर्च करने के संकेत दिए हैं, पर निजी क्षेत्र से अगले पांच वर्षो में जल परिवहन के लिए इसके पांच गुना निवेश की उम्मीद की गई है. इस क्षेत्र में पूंजी लगाने वालों को प्रोत्साहन देने के लिए नई रणनीति को लागू किए जाने की जरूरत है.
जल परिवहन क्षेत्र के विकास के लिए इस बात की वैधानिक व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी कि विभिन्न नदी तटीय इलाकों के कारखाने तथा अन्य उपक्रम अपने माल ढुलाई में एक खास हिस्सा जलमार्गों को दें. जल मार्ग उपयोग करने वालों को कुछ सब्सिडी भी दी जानी चाहिए. इससे अंतर्देशीय जल परिवहन और तटीय जहाजरानी, दोनों को बढ़ावा मिलेगा, सस्ते में परिवहन होगा और इन संगठनों का आधार मजबूत होगा. खासतौर से खतरनाक सामग्री और गैस, पेट्रोल या रसायनों का एक हिस्सा जल परिवहन को आवश्यक रूप से हस्तांतरित किया जाना चाहिए. हम आशा करें कि केंद्र सरकार जल परिवहन को लक्ष्य के अनुरूप रणनीतिक रूप से विकसित करेगी. ऐसा किए जाने से देश में परिवहन के क्षेत्र में एक क्रांति देखने को मिलेगी, जिससे आम आदमी और अर्थव्यवस्था, दोनों लाभान्वित होंगे.

Sunday, November 20, 2016

बजट में बदलाव की बारी | DP Singh

सरकार बजट में बड़े बदलाव की तैयारी में जुटी है। सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन इसके समय से जुड़ा है। केंद्र सरकार फरवरी के बजाय जनवरी में बजट पेश करना चाहती है, जिसके लिए संसद का सत्र करीब एक माह पूर्व बुलाने की तैयारी की जा रही है। दूसरा बदलाव रेल बजट का आम बजट में विलय है। इस संबंध में वित्तमंत्री अरुण जेटली बाकायदा घोषणा कर चुके हैं। तीसरा बड़ा बदलाव आगामी वित्तवर्ष (2017-18) से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करना है। सरकार के अनुसार इन तीनों कदमों से वित्तीय अनुशासन बढ़ेगा, जिससे अर्थव्यवस्था में और प्राण फूंके जा सकेंगे।
अगले साल के शुरू में होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब व गुजरात विधानसभा चुनावों की तिथि का पता चलने के बाद ही बजट की सही-सही तारीख घोषित की जाएगी। वैसे सरकार एक फरवरी को आम बजट और उससे एक दिन पहले आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट पेश करना चाहती है। इस बारे में जल्दी ही संसदीय मामलों की कैबिनेट समिति में चर्चा होगी और फिर लोकसभा अध्यक्ष से विचार-विमर्श किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी सूरत में इकतीस मार्च तक बजट पारित करना चाहते हैं, ताकि नया वित्तवर्ष (एक अप्रैल) शुरू होते ही अमल शुरू हो जाए। आशा है इस बार केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) सन 2016-17 के सकल घरेलू उत्पाद से जुड़े अग्रिम अनुमानित आंकड़े सात जनवरी तक जारी कर देगा। नीति आयोग के सदस्य विवेक देबरॉय और किशोर देसाई की समिति ने आम बजट में रेल बजट के विलय की सिफारिश की थी।
वित्तवर्ष अप्रैल-मार्च के बजाय जनवरी-दिसंबर करने और बजट फरवरी की जगह जनवरी में रखने की मांग पिछले एक दशक से की जा रही है। कई राज्य सरकारें भी यह मांग कर चुकी हैं। ब्रिटिश राज में तय किया गया बजट कार्यकाल, उसे पेश करने का महीना और तारीख अब तक चली आ रही है। परंपरा के अनुसार केंद्रीय बजट फरवरी के अंतिम कार्य दिवस पर सुबह 11 बजे लोकसभा में पेश किया जाता है। वर्ष 2000 तक इसे पेश करने का समय शाम पांच बजे था, जो अंग्रेजों ने अपनी सुविधानुसार तय किया था, क्योंकि जब हिंदुस्तान में शाम के पांच बजते हैं तब ब्रिटेन में दोपहर होती है। बतौर वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने 2001 में पहली बार सुबह 11 बजे लोकसभा में बजट रखा था। अब अगले साल से इसका माह बदलने की तैयारी हो रही है।
फिलहाल दुनिया में बजट दो तरीके से पारित होते हैं। पहली प्रक्रिया तय वित्तवर्ष से काफी पहले शुरू हो जाती है और इसके चालू होने तक समाप्त हो जाती है। करीब पचासी फीसद विकसित देशों ने यह विधि अपना रखी है। अमेरिका में वित्तवर्ष शुरू होने से करीब आठ महीने पहले बजट पेश कर दिया जाता है जबकि जर्मनी, डेनमार्क, नार्वे में चार तथा फ्रांस, जापान, स्पेन, दक्षिण कोरिया में तीन माह पूर्व बजट पेश करना जरूरी है। वहां के संविधान में बाकायदा इसका उल्लेख है। इन देशों की संसद में बजट पर लंबी चर्चा चलती है। चर्चा के दौरान सरकार को अपने हर खर्चे और कर-प्रस्ताव पर स्पष्टीकरण देना पड़ता है। इन मुल्कों के जीवंत लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रमाण यह बजट प्रक्रिया है। वैसे भी माना जाता है कि जहां संसद पर सरकार हावी होती है वहां किसी भी मुद््दे पर बहस के लिए कम वक्त दिया जाता है, और जहां संसद मजबूत होती है वहां जन-प्रतिनिधि सरकार के प्रत्येक प्रस्ताव की लंबी और कड़ी पड़ताल करते हैं।
दूसरी प्रक्रिया में वित्तवर्ष के दौरान ही बजट पारित किया जाता है। ब्रिटेन, कनाडा, भारत और न्यूजीलैंड इस श्रेणी में आते हैं। भले ही भारत में वित्तवर्ष शुरू होने से करीब एक महीना पहले, फरवरी माह में बजट लोकसभा में पेश कर दिया जाता है, पर पारित तो मई के मध्य तक ही होता है। नियमानुसार पेश करने के पचहत्तर दिनों के भीतर बजट पर संसद की मोहर लगना जरूरी है। सरकार अप्रैल से मई के बीच लेखानुदान के जरिये अपना खर्च चलाती है। यह रकम उसकी कुल व्यय-राशि का लगभग सत्रह फीसद होती है। बजट पास होते-होते वित्तवर्ष के दो महीने निकल जाते हैं। फिर विभिन्न मंत्रालय नई योजनाओं पर अमल की रूपरेखा बनाते हैं, जिनकी मंजूरी और पैसा आने में करीब तीन महीने और लग जाते हैं। इसके बाद ही कायदे से धन मिलना शुरू होता है। तब तक बरसात का मौसम शुरू हो जाता है, जिससे इन्फ्रास्ट्रक्चर योजनाओं पर खर्च दो-तीन महीने और टल जाता है। अनावश्यक देरी के कारण अधिकांश योजनागत व्यय वित्तवर्ष की अंतिम छमाही (अक्तूबर-मार्च) में हो पाते हैं, जिस कारण कई बार मंजूर राशि खर्च नहीं हो पाती है। इस कमजोरी का असर विकास और जन-कल्याण से जुड़े कार्यक्रमों पर पड़ता है।
भारत में बजट व्यवस्था पहली बार 7 अप्रैल, 1860 को अंग्रेजों ने लागू की थी। आजाद हिंदुस्तान का पहला बजट आरके षन्मुखम चेट्टी ने 26 नवंबर, 1947 को पेश किया। उसके बाद अस्सी से ज्यादा बजट आ चुके हैं, पर समय शाम पांच से बदल कर सुबह ग्यारह बजे करने के अलावा उसमें कोई अन्य उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं हुआ है। संविधान का अनुच्छेद-112 बजट से जुड़ा है, जिसमें बजट शब्द की जगह इसे सरकार की अनुमानित वार्षिक आय और व्यय का लेखा-जोखा कहा गया है। बजट के समय और वर्ष के विषय में संविधान मौन है, इसलिए उन्हें बदलने के लिए सरकार को संसद की मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। हां, जब से बदलाव की बात निकली है तब से कुछ पार्टियों ने सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग जरूर जड़ दी है। वैसे कांग्रेस सहित अनेक पार्टियां बजट जनवरी में पेश करने के सुझाव से सहमत हैं। सरकार ने साफ कर दिया है कि फिलहाल वित्तवर्ष बदलने का उसका कोई इरादा नहीं है। इसके लिए पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर आचार्य के नेतृत्व में एक समिति गठित की जा चुकी है, जिसकी रिपोर्ट इकतीस दिसंबर तक आने की उम्मीद है। सरकार उसके बाद ही कोई फैसला लेगी। उधर केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) भी जल्द बजट पारित करने के पक्ष में है। उसके अनुसार इससे वित्तवर्ष शुरू होते ही बजट के मुताबिक पैसा खर्च होगा और सरकार को लेखानुदान की जरूरत नहीं पड़ेगी।
दावा किया जा रहा है कि केंद्र का भावी बजट हमारे संघीय स्व
रूप का दर्पण होगा। राज्यों को खर्च के मामले में अधिक स्वायत्तता और स्वंत्रता मिलेगी। वैसे चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार केंद्र सरकार के करों में राज्यों की हिस्सेदारी दस फीसद बढ़ा दी गई है। आयोग की सिफारिशों पर वित्तवर्ष 2015-16 से अमल भी चालू हो गया, पर केंद्र की होशियारी से अधिकतर राज्यों को फायदे के बजाय नुकसान ही हुआ है।
केंद्र ने राज्यों की कर-हिस्सेदारी जरूर दस प्रतिशत बढ़ा दी, लेकिन बदले में केंद्र प्रायोजित योजनाओं (सीएसएस) के मद में कटौती कर दी। उसका तर्क है कि वित्त आयोग ने करों में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाने की बात जरूर की, लेकिन राज्यों को केंद्र से मिलने वाली वित्तीय मदद में विशुद्ध इजाफे की सिफारिश नहीं की है। केंद्र सरकार ने इसी कमजोरी का लाभ उठाया। हालत यह बनी कि वित्तवर्ष 2015-16 में सात सूबों को केंद्र से एक साल पहले के मुकाबले कम रकम मिली। विशुद्ध प्राप्ति की प्रगति तो लगभग हर राज्य में थम-सी गई है। ऐसे में यदि वे अपने ग्रामीण विकास बजट में कटौती करते हैं, तो उन्हें अकेला दोषी कैसे ठहराया जा सकता है? यदि केंद्र ने सच्ची नीयत का परिचय नहीं दिया तब उसके लिए जीएसटी लागू करना भी आसान नहीं होगा।
आज भारत के जीडीपी के मुकाबले कुल कर-संग्रह का अनुपात सत्रह फीसद है। इसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी लगभग दस प्रतिशत है। घरेलू बचत लगभग 7.6 फीसद है। ऊपर से घाटे को तयशुदा सीमा (3.5 प्रतिशत) में रखने का दबाव भी है। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। सरकार की आय का करीब चालीस फीसद पैसा उधार पर ब्याज चुकाने में चला जाता है। ऊपर से कर-आय का करीब 5.8 लाख करोड़ रुपया मुकदमों के कारण फंसा पड़ा है, जिसे उगाहने के लिए वित्तमंत्री ने छूट दी है। कॉरपोरेट टैक्स घटा कर भी एक कमी की गई है। सरकार किसानों के कल्याण के बड़े-बड़े दावे जरूर करती है, पर दावों और हकीकत में भारी अंतर है।
अब बजट के समय ही नहीं, स्वभाव में भी परिवर्तन का प्रयास हो रहा है। भविष्य में योजनागत और गैर-योजनागत खर्च के स्थान पर ‘कैपिटल ऐंड रिवेन्यू एक्सपेंडिचर’ शीर्षक के तहत समस्त व्यय का बंटवारा होगा। आय के बजाय व्यय पर ज्यादा जोर रहेगा। जीएसटी लागू हो जाने से सेवा कर, उत्पाद कर और उप-कर (सेस) जैसे सभी करों का विलय हो जाएगा। इससे बजट में अप्रत्यक्ष कर का विवरण घट जाएगा, बजट सरल होगा और राज्यों को उनके हिस्से की रकम समय पर मिल जाएगी। बजट तैयार करने में कम से कम चार-पांच माह लग जाते हैं। यदि मोदी सरकार अगले वर्ष जनवरी माह में बजट पेश करना चाहती है, तो उसे इसकी तैयारी तुरंत शुरू करनी पड़ेगी। बजट सत्र फरवरी के बजाय जनवरी के तीसरे हफ्ते में बुलाने के लिए संसद को विश्वास में लेना पड़ेगा। साथ ही शीतकालीन सत्र की तारीख भी पहले सरकानी होगी। ये सारे निर्णय लंबे समय तक लटका कर रखने की गुंजाइश नहीं बची है।

अंतरिक्ष बाज़ार में हमारा दमखम

अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक बार फिर इतिहास रचते हुए इसरो ने पीएसएलवी सी-35 के ज़रिए दो अलग-अलग कक्षाओं में सफलतापूर्वक आठ उपग्रह स्थापित कर दिए। दो घंटे से अधिक के इस अभियान को पीएसएलवी का सबसे लंबा अभियान माना जा रहा है। यह पहली बार है जब पीएसएलवी ने अपने पेलोड दो अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित किये। महासागर और मौसम के अध्ययन के लिए तैयार किये गये स्कैटसैट-1 और सात अन्य उपग्रहों को लेकर पीएसएलवी सी-35 ने सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरी थी।
स्कैटसैट-1 के अलावा सात उपग्रहों में अमेरिका और कनाडा के उपग्रह भी शामिल हैं। इसरो का 44.4 मीटर लंबा पीएसएलवी रॉकेट आईआईटी मुंबई का प्रथम और बेंगलुरू बीईएस विश्वविद्यालय एवं उसके संघ का पीआई सैट उपग्रह भी साथ लेकर गया था। प्रथम का उद्देश्य कुल इलेक्ट्रॉन संख्या का आकलन करना है जबकि पीआई सैट अभियान रिमोट सेंसिंग अनुप्रयोगों के लिए नैनो सैटेलाइट के डिजाइन एवं विकास के लिए है।
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब जून में इसरो ने भारत के अंतरिक्ष इतिहास में पहली बार एक साथ 20 सैटेलाइट लॉन्च करके इतिहास रच दिया था। इसमें तीन स्वदेशी और 17 विदेशी सैटेलाइट शामिल थे। इसरो ने इससे पहले वर्ष 2008 में 10 उपग्रहों को पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं में एक साथ प्रक्षेपित किया था। हाल में ही स्वदेशी स्पेस शटल की सफ़ल लांचिंग के बाद दुनिया भर में भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो की धूम मची है। इस सफलता ने 200 अरब डालर की अंतरिक्ष मार्केट में भी हलचल पैदा कर दी है क्योंकि बेहद कम लागत की वजह से अधिकांश देश अपने उपग्रहों का प्रक्षेपण करवाने के लिए भारत का रुख करेंगे। अब समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफ़लता के साथ-साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तरह अंतरिक्ष अन्वेषण पर भी ज्यादा ध्यान दे। इस काम के लिए सरकार को इसरो का सालाना बजट भी बढ़ाना पड़ेगा जो नासा के मुकाबले काफ़ी कम है। भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए अब हमें पीएसएलवी के साथ-साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा।
शशांक द्विवेदी
शशांक द्विवेदी
अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही हैं। इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोड़ा है। असल में, इन देशों को हमेशा यह लगता रहा है कि भारत यदि अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसी तरह से सफ़लता हासिल करता रहा तो उनका न सिर्फ उपग्रह प्रक्षेपण के क़ारोबार से एकाधिकार छिन जाएगा बल्कि मिसाइलों की दुनिया में भी भारत इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है कि बड़ी ताकतों को चुनौती देने लगे। पिछले दिनों दुश्मन मिसाइल को हवा में ही नष्ट करने की क्षमता वाली इंटरसेप्टर मिसाइल का सफल प्रक्षेपण इस बात का सबूत है कि भारत बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा तंत्र के विकास में भी बड़ी कामयाबी हासिल कर चुका है। दुश्मन के बैलेस्टिक मिसाइल को हवा में ही ध्वस्त करने के लिए भारत ने सुपरसोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल बना कर दुनिया के विकसित देशों की नींद उड़ा दी है।
अब पूरी दुनिया में सैटेलाइट के माध्यम से टेलीविजन प्रसारण, मौसम की भविष्यवाणी और दूरसंचार का क्षेत्र बहुत तेजी से बढ़ रहा है और चूंकि ये सभी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं, इसलिए संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि इस क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्धा में हैं, लेकिन यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह मांग उनके सहारे पूरी नहीं की जा सकती। ऐसे में व्यावसायिक तौर पर भारत के लिए बहुत संभावनाएं हैं। कम लागत और सफलता की गारंटी इसरो की सबसे बड़ी ताकत है।
अब अमेरिका भी अपने सैटेलाइट लांचिंग के लिए भारत की मदद ले रहा है जो अंतरिक्ष बाजार में भारत की धमक का स्पष्ट संकेत है। अमेरिका 20वां देश है जो कमर्शियल लांच के लिए इसरो से जुड़ा है। भारत से पहले अमेरिका, रूस और जापान ने ही स्पेस ऑब्जर्वेटरी लांच किया है। वास्तव में नियमित रूप से विदेशी उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण ‘भारत की अंतरिक्ष क्षमता की वैश्विक अभिपुष्टि’ है।
इसरो द्वारा 57 विदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण से देश के पास काफी विदेशी मुद्रा आई है। इसके साथ ही लगभग 200 अरब डालर के अंतरिक्ष बाजार में भारत एक महत्वपूर्ण देश बनकर उभरा है। चांद और मंगल अभियान सहित इसरो अपने 100 से ज्यादा अंतरिक्ष अभियान पूरे करके पहले ही इतिहास रच चुका है। पहले भारत 5 टन के सैटेलाइट लांचिंग के लिए विदेशी एजेंसियों को 500 करोड़ रुपये देता था, जबकि अब इसरो पीएसएलवी से सिर्फ 200 करोड़ में लांच कर देता है। 19 अप्रैल, 1975 में स्वदेश निर्मित उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ के प्रक्षेपण के साथ अपने अंतरिक्ष सफर की शुरुआत करने वाले इसरो की यह सफलता भारत की अंतरिक्ष में बढ़ते वर्चस्व की तरफ इशारा करती है। इससे दूरसंवेदी उपग्रहों के निर्माण व संचालन में वाणिज्यिक रूप से भी फायदा पहुंच रहा है। अमेरिका की फ्यूट्रान कॉरपोरेशन की एक शोध रिपोर्ट भी बताती है कि अंतरिक्ष जगत के बड़े देशों के बीच का अंतर्राष्ट्रीय सहयोग रणनीतिक तौर पर भी सराहनीय है। इससे बड़े पैमाने पर लगने वाले संसाधनों का बंटवारा हो जाता है। खासतौर पर इसमें होने वाले भारी खर्च का भी।
भविष्य में अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी क्योंकि यह अरबों डालर की मार्केट है। भारत के पास कुछ बढ़त पहले से है, इसमें और प्रगति करके इसका बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उपयोग संभव है। कुछ साल पहले तक फ्रांस की एरियन स्पेस कंपनी की मदद से भारत अपने उपग्रह छोड़ता था, पर अब वह ग्राहक के बजाय साझीदार की भूमिका में पहुंच गया है। यदि इसी तरह भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे यान अंतरिक्ष यात्रियों को चांद, मंगल या अन्य ग्रहों की सैर करा सकेंगे।
भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है। इसरो उपग्रह केंद्र, बेंगलुरु के निदेशक प्रोफेसर यशपाल के मुताबिक दुनिया का हमारी स्पेस टेक्नोलॉजी पर भरोसा बढ़ा है तभी अमेरिका सहित कई विकसित देश अपने सैटेलाइट की लांचिंग भारत से करा रहे हैं। इसरो के मून मिशन, मंगल अभियान के बाद स्वदेशी स्पेस शटल की कामयाबी इसरो के लिए संभावनाओं के नये दरवाजे खोल देगी, जिससे भारत को निश्चित रूप से बहुत फ़ायदा पहुंचेगा।

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