Sunday, January 15, 2017

वे चाहते तो आराम की गुजार सकते थे, फिर वे जंगलों में मारे-मारे क्यों फिरते हैं? / अपूर्वानंद

नंदिनी सुंदर और अर्चना प्रसाद अध्यापक और विदुषी हैं. विनीत लेखक और शोधार्थी हैं. ये सब अपनी नींद और चैन गंवाकर बस्तर के जंगलों में क्यों भटकते हैं?

पत्रकार ने पूछा, ‘माओवादी हिंसा का सामना करने में मुक्तिबोध की कविताएं कैसे मदद करती हैं?’ सवाल इतना अटपटा है कि आप हैरान भी नहीं हो सकते. इसमें नासमझी थी, मूर्खता या दुस्साहस? या इनका घालमेल?
यह सवाल रायपुर में पूछा गया जोकि छत्तीसगढ़ की राजधानी है. यही वह राज्य है जिसके एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के कहने पर दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू के अध्यापकों, स्वतंत्र शोधार्थियों, सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर बस्तर में एक व्यक्ति की हत्या की साजिश का मुकदमा न सिर्फ दायर किया गया है, बल्कि उस अधिकारी ने यह धमकी भी दी है कि अगर उन्होंने बस्तर में कदम रखा तो जनता पत्थरों से उन्हें मार डालेगी.
न भूलिए कि राज्य के पुलिस दल ने अभी कुछ वक्त पहले ही नंदिनी सुंदर, बेला भाटिया, हिमांशु कुमार और सोनी सोरी के पुतले जलाए थे. इस पर क्षोभ का ज्वार उठना चाहिए था, लेकिन बेचैनी का कोई बुलबुला भी नहीं उठा. हमने आज तक जनता को सत्ता से जुड़े लोगों का पुतला जलाते तो देखा है, लेकिन राज्य अपने नागरिकों का पुतला जलाए, आज़ाद हिन्दुस्तान में अपनी तरह की यह पहली घटना थी. लेकिन रायपुर तो रहने दीजिए, सुरक्षित और सुसंस्कृत दिल्ली में भी कोई जुबान न हिली.
छत्तीसगढ़ की पुलिस ने इससे समझा कि वह और आगे जा सकती है. नंदिनी सुन्दर, अर्चना प्रसाद, विनीत तिवारी, संजय पराते, मंगलराम कर्मा और मंजु कवासे पर कथित रूप से माओवादियों द्वारा शामनाथ बघेल नामक व्यक्ति की हत्या की साजिश के आरोप लगाते हुए उसने जो प्रथम सूचना रिपोर्ट दायर की, वह इस ढिठाई के बढ़ने का नतीजा है.
पत्रकार के प्रश्न में आप उस दिमाग को भी देख सकते हैं जिसका पूरी तरह से राजकीयीकरण और पुलिसीकरण हो चुका है. वह राज्य के तर्क को हवा और बारिश की तरह कुदरती सच मान चुका है: मुक्तिबोध की कविताओं को माओवादी बीमारी से मुक्त करने के सरकारी अभियान का हिस्सा क्यों नहीं बनाया जा सकता? और अगर वे छत्तीसगढ़ के इस सबसे ज़रूरी काम में मदद नहीं करतीं तो फिर उनकी सामाजिक उपयोगिता ही क्या है?
पत्रकार के सवाल से इस बात का अंदाज मिलता था कि अगर अगली बार आप रायपुर जाएं और आपको माओवाद विरोधी सरकारी अभियान में मुक्तिबोध की तस्वीर या उनकी कविता की पंक्तियां टंकी दिखें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. आखिरकार भारत सरकार ने स्वच्छता मिशन का ब्रांड अम्बैसेडर गांधी को तो बना ही दिया है!
मौक़ा गजानन माधव मुक्तिबोध की जन्मशती की शुरुआत का था. रायपुर, राजनादगांव, खैरागढ़ में एक साथ कई आयोजन हो रहे थे. मुक्तिबोध की भविष्योन्मुखी दृष्टि की अभ्यासवश चर्चा सबमें ही हुई होगी जिसके उदाहरण के तौर पर ‘अंधेरे में’ कविता को प्रायः उद्धृत किया जाता है. देश में सैनिक शासन लगने की आशंका, जिसे कई आलोचक फासिज्म कहते हैं, और उस समय सभ्य समाज की प्रतिक्रिया का वर्णन इन पंक्तियों में देखा गया है:
‘विचित्र प्रोशेसन, / गंभीर क्विक मार्च..../ कलाबत्तूवाली काली ज़रीदार ड्रेस पहने / चमकदार बैंड दल- / ..... / बैंड के लोगों के चेहरे / मिलते हैं मेरे देखे हुओं से / लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार इसी नगर के.’
लेकिन ‘अंधेरे में’ कविता के आठवें अंश में गोली चलने और आग लगने और नगर से भयानक धुएं के उठने का दृश्य भी है. सड़कें सुनसान हैं और फौजी चौकसी है. ऐसी भयंकर स्थिति में शिक्षित समाज क्या कर रहा है?: ‘सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक / चिंतक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं; / उनके ख़याल से यह सब गप है, / मात्र किंवदंती.’
नंदिनी और उनके मित्रों के पुतले जलाने और इन सब पर मुकदमा दायर करने की खबर को अगर ज़्यादातर ने कहानी की तरह पढ़ा हो, तो ताज्जुब नहीं. लेकिन जैसा कवि आगे कहता है, ‘यह कथा नहीं है, यह सब सच है, हां भई!!’
जो लेखक के लिए एक काव्य युक्ति थी, वह फैंटसी छत्तीसगढ़ का यथार्थ बन गई है. क्योंकर यथार्थ गल्प बन गया?
नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद, विनीत तिवारी, संजय पराते, मंगलराम कर्मा और मंजु कवासे को फिलहाल नहीं छुआ जाएगा, ऐसा आश्वासन छत्तीसगढ़ सरकार ने उच्चतम न्यायालय को दिया. न्यायालय ने कहा कि अगर कोई नया तथ्य सामने आता है तो पुलिस कार्रवाई कर सकती है, लेकिन उसके पहले उसे इन सबको एक महीने का वक्त देना होगा.
जिनके नाम आप पढ़ रहे हैं वे एक किस्म के लोग नहीं हैं, न एक विचारधारा के. लेकिन वे साधारण लोग भी नहीं हैं. नंदिनी सुंदर और अर्चना प्रसाद अध्यापक और विदुषी हैं. विनीत लेखक और शोधार्थी तो हैं ही, सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. संजय सीपीएम की छत्तीसगढ़ इकाई के सदस्य हैं. मंजु कवासे सीपीआई की नेता हैं और सुकमा जिले में घुपिड़ी की सरपंच हैं. दो को छोड़कर कोई आदिवासी भी नहीं है.
नंदिनी और अर्चना प्रसाद अंग्रेज़ी के अभिजात समुदाय की सदस्य भी हैं. भारत की अर्थ व्यवस्था की सिरमौर मानी जानेवाली इनफ़ोसिस कंपनी ने समाज शास्त्र के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें पुरस्कृत किया है. फिर यह पूंजीपति वर्ग, जो उदारवादी नज़रिए पर ही टिका है, क्यों चुप है? और क्यों भारत का अभिजात वर्ग खामोश है?
क्यों मान लिया गया है कि राज्य की संस्थाओं का सच प्राथमिक होगा और बाकी सबको उसकी कसौटी या अपेक्षा पर खरा उतरना ही है?
मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं में बार-बार ‘भावना के कर्तव्य’ और ज्ञान के दायित्व की मांग की है. ज्ञान से संवलित भावना कर्तव्यशील होने को बाध्य है. उस कर्तव्य की दिशा तय है. वह उस स्याह गुलाब और सांवली सेवंती के भाग्य से जुड़ा है, जो गृहहीन हैं और दिनभर के श्रम के बाद बरगद के वृक्ष के नीचे थककर गाढ़ी नींद सो रहे हैं.
नंदिनी का काम छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर है. अर्चना प्रसाद जंगलों के सवाल पर काम करती हैं. उनका जीवन शोध पत्र लिखते, किताबें छपाते और सेमिनारों में सहकर्मियों से मिलते-जुलते आराम से गुजर सकता है. वैसे ही विनीत का शोध अनुदान लेते और नीति के दस्तावेज तैयार करते. संजय, मंजु कवासे और मंगलराम कर्मा भी चुनाव-चुनाव खेलते जनतंत्र के दिन काट सकते हैं. फिर ये सब क्यों अपनी नींद भुलाकर और चैन गंवाकर, जिससे मुक्तिबोध का पात्र डरता है, बस्तर के जंगलों में भटकते हैं?
ये सभी मुक्तिबोध की कविता के उस वैज्ञानिक या कलाकार की तरह नहीं, जो ‘मुक्ति का इच्छुक तृषार्त अंतर’ है और मुक्ति के यत्नों के साथ तो निरंतर है, लेकिन है ‘कार्य क्षमता से वंचित व्यक्तित्व’ और ‘असंग अस्तित्व’. ये सब अपने विषय की नियति से जुड़ा महसूस करते हैं, उनके भले जीवन के संघर्ष में उनके साथ हैं. इसीलिए तो उनकी सत्ता से ठन जाती है. फिर वह कोई भी क्यों न हो! जो आदिवासियों को बेदखल कर एक विकसित राष्ट्र बनाने पर आमादा है. उससे भी बढ़कर जो सलवा जुडूम के नाम पर उनका सैन्यीकरण कर उनकी अस्मिता का अपहरण कर लेना चाहती है. और माओवादियों की सत्ता से भी जो आदिवासियों के आज़ाद रहने के हक का इस्तेमाल करने का स्वत्वाधिकार अपने पास रखना चाहते हैं.
मुक्तिबोध का पागल सवाल करता है: ‘बताओ तो किस-किस के लिए तुम दौड़ गये’. नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद, बेला भाटिया, मालिनी सुब्रमण्यम, ईशा खंडेलवाल, मनीष गुंजाम, हिमांशु कुमार, संजय पराते जैसे लोग खुद आदिवासी नहीं, लेकिन ये ही तो मुक्तिबोधीय मनुष्य हैं, अपनी ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान से प्रेरित, जिनकी आत्मा दूर किसी फटे हुए मन की जेब में जा गिरती है. क्या इस रिश्ते के अधिकार की रक्षा पर बात किए बिना मुक्तिबोध का नाम लेने का अधिकार हमें है?

हॉलीवुड अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप का यह वक्तव्य समूची दुनिया के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? / अपूर्वानंद

अक्सर भारतीय संस्कृति का गुणगान करते हुए उसकी पाश्चात्य संस्कृति से तुलना की जाती है और पाश्चात्य संस्कृति को अपसंस्कृति का पर्याय बताया जाता है. अमरीकी संस्कृति को भी पाश्चात्य संस्कृति का ही अंग माना जाता है. लेकिन पिछले दिनों एक घटना ऐसी हुई है जो इस सामान्य धारणा पर पुनर्विचार के लिए विवश करती हैं.
संस्कृति के साथ कुछ शब्द जुड़े हुए हैं. उनमें एक है शिष्टता और दूसरा शालीनता. खुद से अलग या भिन्न का सम्मान और उसे ठेस न पहुंचाना इसमें शामिल है. दूसरों के प्रति सद्भाव को इनके साथ जोड़ लिया जाना चाहिए. इसके साथ ही दूसरों की ज़रूरत का खयाल या उसकी चिंता सुसंस्कृत व्यक्ति का गुण माना जाता है.
वह व्यक्ति जो अपने ग्लास में पानी नहीं छोड़ता या अपनी प्लेट में खाना, उनके मुकाबले अधिक सुसंस्कृत है जो इन दोनों की लापरवाह फिजूलखर्ची करते हैं. जाहिर है, इसमें सावधानी की और निरंतर सचेत रहने की आवश्यकता होती है. यानी आप खुद पर लगातार नज़र रखते हैं.
दूसरे से हुई गलती को नज़रअंदाज करना और उसे दुरुस्त कर देना लेकिन इस तरह कि उसे बुरा न लगे, यह स्वभाव कठिन है और अभ्यास करने से ही आ सकता है, लेकिन है वांछनीय अगर हम परिष्कृति के आकांक्षी हैं.
दूसरे को हीन न दिखाना और किसी भी तरह उसका अपमान न करना भी सुसंस्कृति का ही अंग है. इससे एक दर्जा आगे वे लोग हैं जो दूसरों का अपमान होते देख खामोश नहीं रहते. वे निश्चय ही बाकी के मुकाबले कहीं अधिक सुसंस्कृत हैं जो अन्याय देखकर मुंह नहीं मोड़ते और उससे संघर्ष को अपना दायित्व मानते हैं.
संस्कृत व्यक्ति वह निश्चय ही है जो, काव्य शास्त्र और कला-विनोद में प्रवीण है लेकिन उतना होना पर्याप्त नहीं है. चाहें तो कह सकते हैं कि काव्य और कला उन गुणों की शिक्षा देती हैं जिनकी चर्चा पहले की गई है. लेकिन हम यह भी जानते हैं यह रिश्ता इतना सीधा नहीं है.
हॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री मेरील स्ट्रीप ने पिछले इतवार को गोल्डन ग्लोब्स पुरस्कार समारोह में फिल्मों में अपने काम, यानी अभिनय के लिए पुरस्कार ग्रहण करते समय लगभग पांच मिनट का जो वक्तव्य दिया, वह इसी वजह से सामाजिक और राजनीतिक व्यवहार में शालीनता की बहाली की एक शानदार अपील बन गया है. वह भी ऐसी जिसे सुनकर सिर्फ़ अमरीका के नहीं, पूरी दुनिया के लोग उसमें अपने लिए भी कुछ सुन पा रहे हैं.
एक गलत ढंग से मान लिया गया है कि अभिनय या फिल्म कला की अपील विचार करने लायक नहीं होती है और इसलिए फ़िल्मी दुनिया से जुड़े लोगों को अपने काम से काम रखना चाहिए
संस्कृति का एक गुण या लक्षण यह भी है - सार्वकालिकता और सार्वभौमिकता. मेरील स्ट्रीप अंग्रेज़ी में बोल रही थीं और अमरीकी संदर्भ में बात कर रही थीं लेकिन वे जिस मानवीय आकांक्षा को अभिव्यक्त कर रही थीं, वह भाषा और राष्ट्रीयता की सीमा को लांघ जाती है और सार्वदेशिक बन जाती है.
गोल्डन ग्लोब्स पुरस्कार की आकांक्षा प्रत्येक सिनेकर्मी को होती है. यह पुरस्कार हॉलीवुड फौरेन प्रेस की और से दिया जाता है. माना जाता है सिनेमा से जुड़े लोग अपने प्रशंसकों को नाराज़ नहीं करना चाहते. एक गलत ढंग से मान लिया गया है कि अभिनय या फिल्म कला की अपील विचारातीत (विचार के अयोग्य) होती है और इसलिए फ़िल्मी दुनिया से जुड़े लोगों को अपने काम से काम रखना चाहिए. इसलिए ऐसे मौकों पर उन्हें अपने प्रशंसकों, सहयोगियों का शुक्रिया अदा करना चाहिए, और बस!
सामाजिक मुद्दों पर उनका हस्तक्षेप तो फिर भी स्वीकार्य है, जैसे साक्षरता के लिए या एड्स अथवा कैंसर के विरुद्ध अभियान में हिस्सेदारी, लेकिन जैसे ही वे उस क्षेत्र में प्रवेश करते हैं जिसे राजनीतिक कहा जाता है, अक्सर उन्हें मुंह बंद रखने की सलाह दी जाती है. मेरील स्ट्रीप ने पिछले इतवार की रात जो कहा उसे संकीर्ण रूप से ही राजनीतिक कहा जा सकता है, वह एक व्यापक अर्थ में सामाजिक व्यवहार में परिष्कार की दुहाई थी.
मेरील ने अपनी बात शुरू करते हुए कहा, ‘इस हॉल में अमरीकी समाज के सबसे ज्यादा बदमान तबके के लोग बैठे हैं: हॉलीवुड, विदेशी और प्रेस.’ आगे वे बोलीं,
‘लेकिन हम हैं कौन? और हॉलीवुड ही क्या है, आखिरकार? हॉलीवुड अलग-अलग जगहों का जमावड़ा है...हॉलीवुड बाहरी लोगों और विदेशियों से पटा हुआ है और अगर आप उन्हें निकाल दें तो फुटबाल और मार्शल आर्ट्स के अलावा यहां और कुछ देखने को बचेगा नहीं, जो वास्तविक रूप में कला नहीं है.
मेरील स्ट्रीप डोनाल्ड ट्रंप के उस भाषण के हवाले से अपनी तकलीफ जाहिर कर रही थीं जिसमें डेली न्यूज़ के रिपोर्टर सर्ज कोवाल्स्की के लाचार हाथों की नक़ल उतारते हुए उनकी खिल्ली उड़ाई गई थी
कलाकार का एकमात्र काम उन लोगों के जीवन में प्रवेश करना है जो हमसे अलग हैं और आपको वह महसूस कराना है जो वे महसूस करते हैं और ऐसी शानदार अदाकारी के काफी उदाहरण थे इस साल,...लेकिन एक अभिनय ऐसा था जिसने मुझे स्तब्ध कर दिया, वह मेरे दिल में धंस गया, लकिन इसलिए नहीं कि वह अच्छा था. उसमें कुछ भी अच्छा नहीं था. लेकिन वह असरदार था और उसने अपना काम किया: उसने अपने दर्शकों को हंसाया...यह वह क्षण था जब इस देश के सबसे सम्मानित आसन पर बैठने जा रहे व्यक्ति ने एक विकलांग रिपोर्टर की नक़ल उतारी, जिससे वह पद और प्रतिष्ठा और मुकाबला करने की क्षमता में कहीं आगे है.
इसने मेरा दिल तोड़ दिया और मैं अभी भी इसे अपने ख्याल से निकाल नहीं पा रही क्योंकि यह सिनेमा में नहीं असली ज़िंदगी में किया गया था. दूसरे को अपमानित करने की इच्छा जब सार्वजनिक जीवन के किसी व्यक्ति के माध्यम से व्यक्त होती है तो वह हर किसी की ज़िंदगी में चली जाती है क्योंकि वह सबको ऐसा करने की इजाजत या छूट देती है. अपमान का जवाब अपमान से मिलता है, हिंसा, हिंसा को जन्म देती है. जब ताकतवर लोग अपनी जगह का इस्तेमाल दूसरों पर धौंस जमाने के लिए करते हैं तो हम सबकी हार होती है.’
मेरील स्ट्रीप ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कहीं अमरीका के भावी राष्ट्रपति का नाम नहीं लिया लेकिन वे डोनाल्ड ट्रंप के उस भाषण के हवाले से अपनी तकलीफ जाहिर कर रही थीं जिसमें डेली न्यूज़ के रिपोर्टर सर्ज कोवाल्स्की के लाचार हाथों की नक़ल उतारते हुए उनकी खिल्ली उड़ाई गई थी.
सार्वजनिक आचरण में फूहड़पन के हम आदी हैं और अकसर वह एक विकृत आनंद भी देता है. किसी की शारीरिक अक्षमता या उसके रूप-रंग, मोटापे, उच्चारण के सहारे किसी को नीचा दिखाना, या उसका मज़ाक बनाना हिंदी फिल्मों में आम है. लेकिन वह एक हिंसक इच्छा के साथ भी जुड़ा है - जिसकी खिल्ली उड़ाई जा रही है, उसे इससे क्षति पहुंचेगी, यह ख्याल ही खुशी देता है. मेरील स्ट्रीप ने इस हिंसक प्रवृत्ति का विरोध किया.
यह हिंसक चतुराई पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश में बढ़ती जा रही है और उसे सार्वजनिक स्वीकृति भी मिलती जाती है.
सार्वजनिक आचार में परिष्कार का यह आग्रह अमरीका से हम तक पहुंचे तो उसे सुनने में हर्ज नहीं. जैसे मेरील के मन में ट्रंप की हिंसक अदाकारी धंस गई, हममें से कुछ लोगों के मन में आज भारत के सबसे ताकतवर शख्स के हिंसक अभिनय के कई उदाहरणों के पंजे धंसे हुए हो सकते हैं. कुछ बरस पहले शशि थरूर और उनकी प्रेमिका सुनंदा के बीच रिश्ते का जिक्र करते हुए कहा गया कि शशि थरूर की प्रेमिका पचपन करोड़ की है तो हममें से कम लोगों ने ही उसकी आलोचना की होगी, बल्कि उस वक्तव्य ने हमारे भीतर की हिंसक प्रवृत्ति को सहलाकर उत्तेजित किया.
सोनिया गांधी या चुनाव आयुक्त जेम्स लिंग्दोह के पूरे नामों का धीरे-धीरे पूरा उच्चारण करके उनके हिंदूतर होने की ओर एक हिंसक इशारे पर भी हम आहत नहीं हुए. जैसे अपने विरोधी के साथ यह व्यवहार तो उसे चित्त करने का एक चतुर दांव हो!
यह हिंसक चतुराई पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश में बढ़ती जा रही है और उसे सार्वजनिक स्वीकृति भी मिलती जाती है. हमारे अभिनेताओं में जो सबसे ताकतवर हैं और हमारे खिलाड़ियों में भी, जो इस देश के सबसे संपन्न लोगों में भी हैं, इस हिंसा को नाम देने की हिम्मत नहीं है, उसे चुनौती देने की बात तो छोड़ दीजिए.
समाज धीरे-धीरे इस तरह की हिंसा का आदी होता जाता है. यह सब कुछ देखकर दिल सचमच टूटता है. लेकिन जैसा मेरील स्ट्रीप ने अपने वक्तव्य के अंत में कहा, अपनी एक गुजर चुकी मित्र प्रिंसेस लिया को याद करते हुए, जिन्होंने कहा था, ‘अपने टूटे हुए दिल को कला में बदल दो!’
कला आखिरकार सचाई का बयान या खोज है, और जैसा चंगेज़ आइत्मातोव के नाटक ‘फूज़ियामा’ की एक पात्र कहती है, सचाई ही सबसे बड़ा शिष्टाचार है. यह तो लेकिन हमें पता है कि इस शिष्टाचार का अभ्यास करना इतना सरल नहीं है.

क्या प्रधानमंत्री संस्थाओं सवालों से ऊपर हैं? / रवीश कुमार


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केंद्रीय सूचना आयोग आख़िरी मुक़ाम है जहाँ आप सूचना के अधिकार के तहत इंसाफ़ पाते हैं। इसी में काम करते हैं सूचना आयुक्त एम श्रीधर आचार्यलु। इन्होंने दिल्ली विश्विद्यालय को आदेश दिया कि 1978 में स्नातक करने वाले सभी छात्रों के रिकार्ड की छानबीन की जाए। इसी साल प्रधानमंत्री मोदी ने यहाँ से स्नातक किया है,जिसकी सत्यता को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। इस आदेश के कारण आचार्यलु से मानव संसाधन मंत्रालयों से जुड़ी सूचना की मांग पर फैसले का अधिकार ले लिया गया है। जिस आयोग का काम आपके अधिकारों का संरक्षण करना है,उसके ही आयुक्त को अपना काम करने की सज़ा दी जाती है।क्या सही दस्तावेज़ रखकर हमेशा के लिए इस विवाद को ख़त्म नहीं कर देना चाहिए। आपने डिग्री ली है तो डरने की क्या बात।नहीं भी ली हो तो कोई बात नहीं। सवाल करने वाला यही जानना चाहता है कि आपने डिग्री ली या नहीं। प्रधानमंत्री बनने के लिए डिग्री नहीं चाहिए मगर सवाल उठा है तो विश्वविद्यालय प्रश्नकर्ता को तो दिखा ही सकता है। आयोग को भी दिखा सकता है ताकि शक की गुज़ाइश न रहे।यह ख़बर सब जगह छपी है मगर सब जगह चुप्पी है।
क्या प्रधानमंत्री कानून और तथ्यों से ऊपर हैं? क्या वही अपने आप में तथ्य हैं,सत्य हैं।तमाम संस्थाएँ अब ये बात जनता को भी अपनी इन हरकतों से बताने लगी हैं।आज के इंडियन एक्सप्रेस में ऋतु सरीन की ख़बर छपी है।इसे पढ़ियेगा और खुले दिमाग़ से सोचियेगा।सहारा बिड़ला पेपर्स विवाद के बारे में आप जानते ही होंगे।इन पेपर्स में कई नेताओं के नाम थे मगर इसे प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ मुद्दा बनाया गया क्योंकि उनके भी नाम थे।सुप्रीम कोर्ट ने इन काग़ज़ात की जाँच कराने से इंकार कर दिया है।
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सुप्रीम कोर्ट से पहले इसी मामले की सुनवाई आयकर विवादों के निपटारे के लिए ट्राइब्यूनल में चल रही थी। इसे इंकम टैक्स सेटलमेंट कमिशन (ITSC) कहते हैं । इस संस्था को नब्बे दिनों के भीतर विवादों का निपटाना होता है। पाँच साल में इस संस्था ने एक भी केस नब्बे दिनों के भीतर नहीं निपटाया है। आयोग ने इस मामले की सुनवाई करते हुए आयकर विभाग से किसी जांच की मांग नहीं की। वरिष्ठ पत्रकार ऋतु सरीन को आयोग ने लिखित रूप से जवाब दिया है कि सहारा पेपर्स मामले की सुनवाई सबसे जल्दी पूरी गई है। पाँच साल में एक भी मामले की इतनी जल्दी सुनवाई नहीं हुई है। पाँच सितंबर 2016 को यह मामला आया और 11 नवंबर को फैसला। आयोग ने भी बिना काग़ज़ात की मांग किये फैसला दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में जाँच की ज़रूरत नहीं समझी।
प्रधानमंत्री शुचिता और पारदर्शिता की बात करते हैं । लोग उनकी बातों पर यक़ीन भी करते हैं। क्या लोगों के विश्वास को बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री को ख़ुद इन आदेशों पर नहीं बोलना चाहिए। हो सकता है कि ये आरोप बेबुनियाद हो,फालतू हों मगर दूसरों का इम्तहान लेने वाले प्रधानमंत्री को कहना चाहिए था कि जल्दी जाँच कीजिये और सारे दस्तावेज़ पब्लिक को दे दीजिये। मैं किसी बात से ऊपर नहीं हूँ। लगता है उनकी सारी बातें विरोधियों के लिए हैं। उनके समर्थकों को भी इन सब बातों से फर्क नहीं पड़ता।
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कटनी,मध्यप्रदेश के एसपी गौरव तिवारी के तबादले की ख़बर जब शहर में पहुँची तो गौरव तिवारी के समर्थन में लोग सड़कों पर उतर आए।सोशल मीडिया पर समर्थन जताने लगे।गौरव ने कटनी में पाँच सौ करोड़ के हवाला नेटवर्क का भांडाभोड़ किया है। जाँच चल रही थी कि तबादला हो गया। कांग्रेस विधायक का आरोप है कि बीजेपी के मंत्री का नाम है।ऐसे मामलों की ठीक से जाँच हो जाए तो क्या पता कांग्रेस नेताओं के भी नाम आ जाएँ। सलाम कटनी की जनता का जिसने एक ईमानदार और साहसी अधिकारी को अकेला नहीं छोड़ा। मंगलवार को कटनी के लोगों ने नगर बंद का आयोजन कर न सिर्फ सरकार को चुनौती दी बल्कि गौरव जैसे अधिकारियों को संदेश दिया कि उनकी मेहनत पानी में नहीं गई है। जनता ऐसे लोगों का समर्थन करती है। महानगरों से अच्छी है कटनी की जनता जिसने एक अफसर के लिए वक्त निकाला। अब आपको पाँच सौ करोड़ के हवाला नेटवर्क के बारे में कुछ नहीं पता चलेगा। आप अभिशप्त हैं नेताओं की बातों पर ही यक़ीन करने के लिए कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ वही लड़ रहे हैं। बाकी सब लड़ने को क़ाबिल ही नहीं।
क्या भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा करने वाले नेताओं के लिए, नैतिकता के लिए ही सही,यह ज़रूरी नहीं कि आईपीएस गौरव तिवारी के समर्थन में बोलें। हर बात पर प्रधानमंत्री का बोलना ज़रूरी नहीं लेकिन ऐसे मौकों पर बोल कर भ्रष्टाचार के नेटवर्क से लड़ने वाले जवानों और अफ़सरों का हौसला नहीं बढ़ा सकते थे। सब कुछ सत्ता पर बैठे लोगों के हिसाब से हो रहा है, उनका समर्थन करने वाले लोगों के लिए जो भी हो रहा है सही हो रहा है।

मेरिल स्ट्रीप का भाषण / रवीश कुमार


गोल्डेन ग्लोब्स में सेसिल बी डिमेले सम्मान को स्वीकारते हुए प्रसिद्ध अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप का भाषण। इसके बाद इस भाषण की प्रतिक्रिया में लिखा दो लेख पढ़ सकते हैं। अपूर्वानंद ने Satyagrah.scroll.in पर हिन्दी में लिखा है और प्रकाश के रे ने Bargad.org पर मेरिल को अंग्रेज़ी में एक पत्र लिखा है।
आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद. धन्यवाद. कृपया बैठ जाएं. कृपया बैठ जाएं. धन्यवाद. मैं आप सभी को बहुत प्यार करती हैं. आपको मुझे माफ करना होगा. मैंने इस सप्ताहांत चिल्लाने और अफसोस जाहिर करने में अपनी आवाज खो दी है. और इस साल के शुरू में कभी मैंने अपना दिमाग भी खो दिया है. इसलिए मुझे पढ़ कर बोलना होगा. शुक्रिया, हॉलीवुड विदेशी प्रेस. ह्यूग लौरी की बात से शुरू करती हूं. आप और इस कक्ष में मौजूद हम सभी, सचमुच, अभी अमेरिकी समाज के सबसे तिरस्कृत लोग हैं. इस बारे में सोचें. हॉलीवुड, विदेशी, और प्रेस. लेकिन हमलोग हैं कौन? और, आप जानते ही हैं कि हॉलीवुड क्या है. दूसरी जगहों से आये हुए लोगों का एक समूह.
मैं न्यू जर्सी में पली-बढ़ी और वहां के पब्लिक स्कूलों में मेरी रचना हुई. वायोला डेविस साउथ कैरोलाइना में बटाई पर खेती करनेवाले घर में पैदा हुई थीं, और वे लॉन्ग आइलैंड के सेंट्रल फाल्स में बड़ी हुईं. सारा पॉलसन को अकेली मां ने ब्रूकलिन में पाला-पोसा. ओहायो की सारा जेसिका पार्कर सात-आठ संतानों में एक थीं. एमी एडम्स इटली में पैदा हुई थीं. नताली पोर्टमैन जेरूसलम में जन्मी थीं. उनके जन्म प्रमाण पत्र कहां हैं? और सुंदर रुथ नेग्गा इथियोपिया में पैदा हुईं और शायद उनका लालन-पालन आयरलैंड में हुआ. और इस पुरस्कार समारोह में उन्हें वर्जीनिया की एक छोटे शहर की लड़की की भूमिका के लिए नामित किया गया है. सभी भले लोगों की तरह ही रेयान गॉस्लिंग कनाडा से हैं. और देव पटेल केन्या में पैदा हुए, लंदन में पले-बढ़े, और इस समारोह में तस्मानिया में बड़े हुए एक भारतीय की भूमिका निभाने के लिए मौजूद हैं.
हॉलीवुड बाहरी और विदेशी लोगों से भरा पड़ा है. अगर आप उन सभी को बाहर फेंक देंगे, तो आपके पास फुटबॉल और मार्शल आर्ट्स (जिनमें कोई कला नहीं है) के खेल देखने के अलावा कुछ और नहीं बचेगा. उन्होंने यह कहने के लिए मुझे तीन सेकेंड का समय दिया था. अपने से भिन्न लोगों के जीवन में प्रवेश करना और आप तक उसके अनुभव को पहुंचाना ही किसी अभिनेता या अभिनेत्री का एकमात्र काम है. और इस साल के अनेक, ढेर सारे अभिनेताओ-अभिनेत्रियों ने अपने प्रभावपूर्ण और गंभीर काम से यही किया है.
इस साल एक ऐसा अभिनय प्रदर्शन रहा है जिसने मुझे हैरान कर दिया. इसके कांटे मेरे दिल में धंस गये. ऐसा इसलिए नहीं कि यह अच्छा था. उसमें कुछ भी अच्छा नहीं था. लेकिन यह असरदार था और इसने अपना काम किया. इसने अपने लक्षित दर्शकों को हंसाने और अपनी दांत दिखाने का उद्देश्य पूरा किया. यह वह क्षण था जब हमारे देश के सबसे सम्मानित पद पर बैठने के आकांक्षी एक व्यक्ति ने एक विकलांग संवाददाता की नकल की जिससे उस व्यक्ति के धन, संपदा, ताकत और उलटवार करने की क्षमता से कोई तुलना नहीं की जा सकती है. जब मैंने यह देखा, तो मेरा दिल टूट गया. मैं अब भी इसे अपने दिमाग से हटा नहीं पा रही हूं क्योंकि ऐसा किसी फिल्म में नहीं हुआ था. यह वास्तविक जीवन था.
और, किसी सार्वजनिक मंच से, किसी ताकतवर द्वारा किसी को अपमानित करने की यह भावना सभी के जीवन पर असर डालती है क्योंकि इससे दूसरों को भी ऐसा ही करने की एक तरह अनुमति मिल जाती है. अनादर से अनादर पैदा होता है. हिंसा हिंसा को भड़काती है. जब ताकतवर अपनी स्थिति का इस्तेमाल दूसरों को दबाने के लिए करता है, तब हम सभी पराजित होते हैं.
इस बात से मैं प्रेस पर आती हूं. हमें एक सिद्धांतवादी प्रेस की जरूरत होती है जो सत्ता को जवाबदेह बना सके, जो उनकी हर गलती पर अंगुली उठा सके. इसी वजह से हमारे संस्थापकों ने प्रेस और उसकी आजादी को हमारे संविधान में उल्लिखित किया है. इसलिए मैं अपनी पहुंच के लिए प्रसिद्ध हॉलीवुड विदेशी प्रेस और हमारे तबके के सभी से यह निवेदन करती हूं कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बनी समिति को समर्थन देने के लिए आगे आयें. क्योंकि हमें आगे बढ़ने के लिए उनके साथ की जरूरत है. और, उन्हें सच की सुरक्षा के लिए हमारी जरूरत है.
एक बात और. एक दफा मैं फिल्म सेट पर खड़ी शिकायत कर रही थी कि क्या हम खाने के समय पर भी काम करते रहेंगे या घंटों शूटिंग चलती रहेगी आदि आदि. इस पर टॉमी ली जोंस ने मुझसे कहा, मेरिल, क्या यह बड़ी बात नहीं है कि हम कलाकार हैं. हां, यह बड़ी बात है. और हमें एक-दूसरे को इस हैसियत तथा सहानुभूति के उत्तरदायित्व की याद दिलाते रहना होगा. हम सभी को उन उपलब्धियों पर गर्व होगा जिन्हें आज हॉलीवुड पुरस्कृत कर रहा है.
जैसा कि मेरी प्यारी दोस्त दिवंगत प्रिंसेस लीआ ने एक बार मुझसे कहा था, अपने टूटे हुए दिल को कला में बदल दो. धन्यवाद.

तीनों बन्दर बापू के / नागार्जुन

मूंड रहे दुनिया-जहान को तीनों बन्दर बापू के!
चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बन्दर बापू के!
करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बन्दर बापू के!
बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बन्दर बापू के!
गाँधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बन्दर बापू के!
असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बन्दर बापू के!
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
- नागार्जुन

Wednesday, January 11, 2017

बासवन्ना (बारहवीं सदी, कन्नड़ में) लिखित

जब वे एक पत्थर से बने सर्प को देखते हैं
तो उसपर दूध चढ़ाते हैं.
यदि असली सांप आ जाए तो
कहते हैं- "मारो, मारो."
देवता के उस सेवक को
जो भोजन परसने पर
खा सकता है,
वे कहते हैं-
"चल हट, दूर जा, दूर रह."
लेकिन ईश्वर की पाषाण प्रतिमा को
जो खा नहीं सकती,
वे छप्पन भोग व्यंजन परोसते हैं.
--बासवन्ना (बारहवीं सदी, कन्नड़ में)

क्या हिन्दी अख़बार भी कूड़ा परोस रहे हैं? | रवीश कुमार

मेरे ब्लॉग की क्षमता दस बीस हज़ार लोगों तक पहुंचने से ज़्यादा की नहीं होगी फिर भी मैं हिन्दी के करोड़ों पाठकों से यह सवाल करना चाहता हूं कि क्या आपको पता है कि हिन्दी चैनलों की तरह हिन्दी के अख़बार आपको कूड़ा परोस रहे हैं। पिछले दस सालों में चैनलों की खूब आलोचना हुई है। इसका असर ये हुआ है कि चैनल और भी कूड़ा परोसने लगे हैं। रिपोर्टर ग़ायब कर दिये गए हैं। उनकी जगह स्ट्रिंगर लाए गए, अब उन्हें भी ग़ायब कर दिया गया है। लेकिन हिन्दी के अख़बार सख़्त समीक्षा से बच जाते हैं। आज भी इन अख़बारों के पास ज़िले तक में पांच दस पूर्णकालिक संवाददाता तो मिल जायेंगे। तमाम संस्करणों में इनके सैंकड़ों पत्रकार हैं। फिर भी ख़बर की धार ऐसी कर दी जाती है कि सरकार बहादुर या कलेक्टर तक नाराज़ न हों। ख़बर हिन्दी अख़बारों में होती है मगर सरकार के दावों की जांच करने वाली ख़बरें नहीं होती हैं। होती भी हैं तो अपवाद स्वरूप। हिन्दी के पत्रकारों को बांध दिया गया है और वे भी ये गाना खुशी खुशी गा रहे हैं। कि पग घुंघरू बांध मीरा नाची थी…मीरा नाची थी…और हम नाचे बिन घुंघरू के।
11 जनवरी का इंडियन एक्सप्रेस देखिये। पहले पन्ने पर ख़बरहै कि दिसंबर महीने में ऑटोमोबिल की बिक्री में जितनी गिरावट देखी गई है, उतनी सोलह साल में नहीं देखी गई। इंडियन आटोमोबिल मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन ने ये आंकड़े जारी किये हैं। दुपहिया वाहनों की बिक्री 22 प्रतिशत कम हुई है। दिसंबर 2015 की बिक्री की तुलना में। 1997 के बाद किसी एक महीने में यह अधिकतम गिरावट है। 75 फीसदी बाज़ार स्कूटर और मोटरसाइकिल का है। आपने पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर में ही देखा होगा कि सूक्ष्म, लघु उद्योग में 35 प्रतिशत रोज़गार कम हुआ है। उत्पादन में गिरावट आई है।
कहीं 35 फीसदी रोज़गार कम होने का असर दुपहिया वाहनों की बिक्री पर तो नहीं पड़ा। या नोटबंदी के कारण सारा पैसा बैंक में बंद हो गया इस वजह से। क्या स्कूटर मोटरसाइकिल के ख़रीदार भी काला धन रखने वाले हैं? एक्सप्रेस लिखता है कि दिसंबर 2015 की तुलना में दिसंबर 2016 के दौरान वाहनों के उत्पादन में 21.8 प्रतिशत की कटौती की गई है। दुपहिया वाहनों के उत्पादन में 25.2 प्रतिशत की कटौती की गई है। अब आप सोचिये कि इसका रोज़गार पर क्या असर पड़ा होगा। नौकरियां कितनी गई होंगी। इसी तरह रियालिटी सेक्टर भी पूरी तरह धंस गया है। जहां रोज़ाना अस्थायी रोज़गार पैदा होते हैं। क्या सरकार के किसी बयान या दावे में इन आंकड़ों या इसके असर की कोई चिन्ता है। उम्मीद है ये ख़बर हिन्दी अख़बारों और चैनलों पर प्रमुखता से चल रही होगी।
एक्सप्रेस में एक और ख़बर है। इस ख़बर के आधार पर आप हिन्दी अख़बारों के वर्षों से मंत्रालय और पार्टी मुख्यालय की बीट पर बुढ़ा रहे पत्रकारों की धार का अंदाज़ा कर सकते हैं। उनके पास भी ये ख़बर होगी मगर लिखने का साहस नहीं जुटा सके होंगे। 31 सितंबर 2016 को एक्सप्रेस ने एक ख़बर छापी कि जनधन खातों में बैंक दूसरी तरीके से हेराफेरी कर रहे हैं। शून्य जमा खातों से सरकार की बदनामी हो रही है क्योंकि वो एक तरह से ग़रीबी का भी मानक बन जाता है। इसलिए बैंकों ने अपने कर्मचारियों से कहा कि एक एक रुपया डाले। क्या ये काला धन बनाने की प्रक्रिया नहीं है। सिर्फ धन ही नहीं, आंकड़े भी काले होते हैं। तब बैंकों और सरकार ने इस ख़बर से किनारा कर लिया था। किसी चैनल या अखबार ने इसका फोलो अप नहीं किया क्योंकि सरकार के दावे की जांच करने का जोखिम है।
इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार श्यामलाल यादव ने कई महीने बाद इस स्टोरी का फोलो अप किया है। आर टी आई से सूचना हासिल कर लिखा है कि बैंक आफ बड़ौदा और बैंक आफ इंडिया ने माना है कि उनके ब्रांच स्टाफ ने अपनी जेब से एक एक रुपया डाल कर शून्य जमा वाले जनधन खातों को समृद्ध किया है। कई और बैंकों में इसी तरीके की बात मानी है। एक ब्रांच में दस बीस कर्मचारी होते हैं लेकिन खातों की संख्या सैंकड़ों और हज़ारों में हो सकती है। इसलिए इसके लिए ब्रांच के पास अन्य मदों के लिए उपलब्ध पैसों से भी शून्य जमा जनधन खातों को भरा गया। इससे क्या हुआ? सितंबर 2014 में 76 फीसदी जनधन खातों में कोई पैसा नहीं था। ऐसे खातों का प्रतिशत अगस्त 2015 तक घटकर 46 फीसदी रह गया। अगस्त 2016 में 24.35 फीसदी पर आ गया।
सरकार इन्हीं आंकड़ों को लेकर खेल करती है। सरकार अक्सर जनधन खातों में जमा राशि को कामयाबी की तरह बताती है। आम पाठक के पास इन दावों की जांच का कोई आधार नहीं होता। अब आप इसे दूसरी तरीके से देखिये। कैसे सूचना और आंकड़ों के खेल से लोकतंत्र की हत्या हो रही है। लाखों बैंक कर्मचारियों को मजबूर किया गया। उन्होंने उफ्फ तक नहीं किया और अपनी जेब से पैसे जमा किये। उनका पैसा जमा हुआ और पब्लिक तक यह सूचना पहुंची कि ग़रीब लोगों ने जमा किया और यह सरकार की बड़ी कामयाबी है। श्यामलाल यादव की यह ख़बर पढ़ते हुए आप यह भी सीखेंगे कि पत्रकारिता कैसे की जाती है। क्या इस तरह की श्रमसाध्य पत्रकारिता आपको हिन्दी के उन अख़बारों में देखने को मिल रही है। इसलिए नहीं मिलती क्योंकि उनका संपादक पब्लिक की निगाह की जांच से बचा रहता है। सौ फीसदी चांस है कि यह ख़बर किसी हिन्दी के पत्रकार के पास भी हो।
एक्सप्रेस ने ही 10 जनवरी को एक और खबर छापी। इस खबर को पढ़ने के बाद मैंने हिन्दी के दस पाठकों से पूछा कि क्या आपको पता है कि सरकार ने रिज़र्व बैंक से कहा था कि वो नोटबंदी करना चाहती है। किसी को पता नहीं था। सबने कहा कि मेरे अख़बार में तो ऐसा कुछ नहीं आया है। इसीलिए मैं कई बार कह रहा हूं कि अंग्रेज़ी अख़बारों या thewire.in , epw.org जैसी वेबसाइट पर जो समीक्षाएं छप रही हैं उन्हें जानबूझ कर देसी भाषा के पाठकों तक पहुंचने नहीं दिया जा रहा है।भारतीय रिज़र्व बैंक ने यह सब संसदीय समिति को अपने लिखित जवाब में कहा है। इसलिए मान लेना चाहिए कि इनकी विश्वसनीयता किसी भी मंत्री के दावे से ज़्यादा है।
10 जनवरी की एक्सप्रेस की पहली ख़बर कहती है कि 7 नवंबर को सरकार ने रिज़र्व बैंक को नोटबंदी की सलाह दी और विचार करने के लिए कहा। आठ नवंबर की सुबह रिज़र्व बैंक ने अपनी सहमति दे दी। इतने बड़े मसले पर 24 घंटे के भीतर रिज़र्व बैंक ने विचार कर सहमति भी दे दी। प्रधानमंत्री कहते हैं कि राजनीतिक दलों के चंदों के बारे में चर्चा होनी चाहिए। ग़ज़ब। जाली नोटों के बारे में तो समझ सकते हैं लेकिन आतंकवाद और नक्सलवाद में काले धन या इन नोटों का इस्तमाल हो रहा है, इसकी जानकारी और विशेषज्ञता भारतीय रिज़र्व बैंक को भी होती है, यह मुझे नहीं मालूम था। हो सकता है भारतीय रिज़र्व बैंक अपनी स्वायत्तता गिरवी रखने के बाद अब गृह मंत्रालय के अधीन भी काम करने लगा हो। आतंकवाद और नक्सवाल में 500 और 1000 रुपये के नोटों का हाथ है, इस नतीजे पर रिजर्व बैंक चौबीस घंटे के भीतर किनकी मदद से पहुंच गया। इस संस्था की साख चौपट होती जा रही है।
एक्सप्रेस की रिपोर्ट कहती है कि 7 अक्तबूर 2014 को भारतीय रिज़र्व बैंक ने पांच हज़ार और दस हज़ार के नोट जारी करने का सुझाव दिया था। मई 18 2016 में सरकार ने सुझाव दिया कि 2000 के नोट छापे गए। अब यहां देखिये। 2014 के सुझाव पर 2016 में जवाब आता है। मौद्रिक नीतियों और फैसलों के मामले में रिज़र्व बैंक से ज़्यादा सरकार सोचने का काम करने लगी है। जब भारतीय रिज़र्व बैंक अक्तूबर में पांच हज़ार और दस हज़ार के नोट जारी करने का सुझाव दे रहा था तब उसने गृहमंत्रालय और खुफिया विभाग से पूछ लिया था कि कहीं पांच सौ और हज़ार के नोट से आतंकवाद और नक्सलवाद तो नहीं फैल रहा है। दस हज़ार के नोट से कहीं आतंकवाद दस गुना तो नहीं बढ़ जाएगा। सरकार ने रिज़र्व बैंक को क्या जवाब दिया होगा। यही कि भाई दस गुना बड़ा नोट छापोगे तो आतंकवाद दस गुना बढ़ जाएगा। एक्सप्रेस ने कुछ दिन पहले ही ख़बर छाप दी थी कि संसदीय समिति ने रिज़र्व बैंक से जवाब मांगा है। इसके बाद भी हिन्दी चैनलों और अख़बारों ने कोई सक्रियता नहीं दिखाई। क्योंकि कोई भी अब ऐसी ख़बरों का पीछा नहीं करना चाहता जिसके कारण सरकार की पोल खुले।
एक दो ख़बरों के आधार पर हिन्दी के अख़बारों का मूल्याकंन करने पर भी सवाल हो सकता है लेकिन आप परिपाटी देखिये तो पता चलेगा। इसीलिए फिर से कहता हूं कि दो लाख चार लाख रुपये देकर घटिया प्राइवेट संस्थानों और उनके घटिया शिक्षकों से पत्रकारिता के छात्रों और छात्राओं का जीवन बर्बाद किया जा रहा है। इस उम्र में तेज़ दौड़ने वाले घोड़े को खच्चर बनाया जा रहा है। बेहतर है आप अपनी जवानी में ही संभल जाएं। जबकि बैंकों में हिन्दी के पत्रकारों के ज़्यादा बेहतर संबंध होते हैं। वो अंग्रेज़ी के पत्रकारों से ज़्यादा सक्षम हैं लेकिन हिन्दी के अखबारों में पत्रकारिता बंद है। इनके अनाम और अनजान संपादकों की हरकतों पर आपकी कम नज़र होती है। ये लोग ज़्यादा बेहतर तरीके से सेटिंग कर लेते हैं और आम पाठक को पता तक नहीं चलता। क्या ये अच्छा नहीं होगा कि संपादक मंडली का नाम पिछले पन्ने के सबसे नीचे की जगह पहले पन्ने पर फोटो के साथ छपे और अब मृत प्राय हिन्दी चैनलों को छोड़ कर इन अख़बारों का भी विश्लेषण करें। मेरी राय में किसी भी राजनीतिक बीट पर दो साल से ज्यादा कोई पत्रकार नहीं होना चाहिए। तमाम रिपोर्टरों में पोलिटिकल बीट के रिपोर्टर का पदनाम बड़ा होता है, सैलरी ज़्यादा होती है। जबकि अखबार या चैनल को नज़र नहीं आ रहा है कि इनकी ज़रूरत रही नहीं। इन्हें वहां से हटा कर कहीं और लगा देना चाहिए। क्योंकि राजनीतिक दल तो अपनी ख़बर ख़ुद ही ट्वीट कर देते हैं। जब वे बीस साल वाले अनुभवी पत्रकार से ख़बरें प्लांट करवा सकते हैं तो दो साल से भी करा लें। ज़रूरी है कि राजनीतिक बीट को लेकर बहस हो और नई प्रणाली बने। आमीन।
नोट- अब आप यह मत कहियेगा कि इस पर लिखा तो उस पर क्यों नहीं लिखा। भाई साहब, आपको लगता है कि मैंने किसी पर नहीं लिखा तो आप लिख दीजिए। जय हिन्द।

संस्कृत में रचने के कारण विद्यापति को इतिहासकारों ने भुला दिया | रवीश कुमार


बिहार की राजधानी पटना में एक म्यूज़ियम है। ठीक उसके पहले विद्यापति भवन है। जब भी विद्यापति जयंती का टाइम आता था, यह सड़क ओहदेदार फलां झा जी, फलां मिश्रा जी की गाड़ियों से भर जाती थी। दसवीं के क्लास में विद्यापति की एक कविता पढ़ी थी, आएल ऋतुपति राज बसंत। जानना एक भ्रम है। इसी भ्रम के तहत वर्षों तक लगता रहा कि हम भी विद्यापति को जानते हैं। क्या लिखा है, क्या गाया है, और क्या क्या किया है, इन सब बातों को जाने बग़ैर भी लगता रहा कि विद्यापति को जानते हैं। आज पता चला कि कुछ नहीं जानते हैं।
वाणी प्रकाशन से छपने वाले 350 रुपये के प्रतिमान का यह अंक लाजवाब है। विद्यापति पर पीएचडी करने वाले पंकज कुमार झा ने करीब 52 किताबों और संदर्भ ग्रंथों का हवाला देते हुए 18 पन्नों के लेख में विद्यापति और मिथिला जगत की मज़ेदार सैर कराई है। ऐसा लग रहा था कि आप स्कूटर से विद्यापति के विशाल रचना संसार और ऐतिहासिक संदर्भों का एक चक्कर लगा आए हैं। कार से चक्कर लगाने के लिए आपको पंकज की किताब का इंतज़ार करना पड़ेगा। पहला झटका यही लगता है कि विद्यापति संस्कृत के कवि ज़्यादा थे। उनकी आधी से अधिक रचना संस्कृत में है। इस लेख में इतिहास के विद्यार्थी की नज़र से काफी कुछ जानने को मिलेगा। आज के इंटरनेटीय पाठकों के लिए भी इस लेख से विद्यापति के बारे में दस महत्वपूर्ण बातें टाइप की गुज़ाइश बनती है। जिसे दो मिनट में स्क्रोल करते हुए काफी कुछ जाना जा सकता है। आज कल तमाम वेबसाइट इसी तरह की सुर्ख़िया लगाते हैं। जानिये इस भाषा में क्यों रचते थे विद्यापति। पूरा का पूरा लेख चित्रशैली में लिखा हुआ है।
“यानी हिंदी जगत में स्थापित प्रचलन के विपरीत विद्वानों को समय व विद्वतपरंपरा की वह कौन सी परिस्थितियां थीं, जिसने विद्यापति जैसे बहुभाषी कवि के पनपने की संभावनाएं पैदा कीं।” मध्यकाल के आधुनिक इतिहासकारों और हिन्दी साहित्य जगत के निर्माताओं ने विद्यापति को फुटनोट में डालकर क्यों छोड़ दिया। इन दो सवालों के जवाब में पंकज कई तरह की दिलचस्प जानकारियों से हमारा परिचय कराते हैं। “ साथ ही यह भी रेखांकित करना आवश्यक है कि आधुनिक काल में,ख़ासकर आज़ादी के बाद, विद्यापति जिस ‘गौरवशाली मैथिल संस्कृति’ के प्रतीक चिन्ह बनकर उभरे हैं, उसमें ग़ैर द्विज एवं ग्रामीणों की भागीदारी लगभग नगण्य है।” पंकज इस सवाल का जवाब भी खोज रहे हैं।
वैसे विद्यापति का असर इतना गहरा था कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपनी किशोरावस्था में भानु सिंह के नाम से विद्यापति की नकल की कोशिश की थी। 1097-1320 के बीच कर्नाटक से आया योद्धा कुल के नान्यदेव ने मिथिला में कणार्ट वंश की स्थापना की थी। कुछ समय बाद मोहम्मद तुग़लक ने आइनी गांव के एक ब्राह्मण कामेश्वर ठाकुर को,जो आख़िरी कर्णाट शासक हरिसिंहदेव के राजपुरोहित थे, तिरहुत के सिंहासन पर बिठाया। आगे जो वंश चला उसे ओइनिवार वंश के नाम से जाना गया। रानी लखिमा देवी और रानी विश्वास देवी के भी राजसिंहासन पर बैठने का उल्लेख मिलता है।जयपुर लिट मेले में मुझे एक बार मैथिली गीतों की जानकार विभा रानी ने बताया था कि ज़माने तक कर्णाटक की नाटक और संगीत मंडली मिथिला आया करती थी और मिथिला वाली मंडली कर्णाटक जाती थी। विभा जी बताती हैं कि मैथिली शब्द और वाक्य संरचना तुरु भाषा में बहुत अधिक है। शेट्टी लोग तुरु बोलते थे। वैसे मैथिली का पहला अख़बार जयपुर से निकला था। मैथिली भी कम नैशनल नहीं है।
पंकज ने उन जड़ों की भी पड़ताल की है,जहां से विद्यापति को रचना संसार की विरासत मिलती है। मिथिला क्षेत्र में ग्यारहवीं सदी से लेकर सोलहवीं सदी के बीच संस्कृति ग्रंथों का भरमार मिलता है। पंकज अब यहीं से मध्यकाल के इतिहासलेखन की कान पकड़ते हुए पड़ताल करते हैं कि विद्यापति की अवहेलना क्यों हुई। कारण मध्यकाल के इतिहासकारों को फ़ारसी क़िताबों का ख़ज़ाना मिल गया। वे उस ख़ज़ाने में ही खोए रहे और ज़माने से बेख़बर हो गए। फ़ारसी और संस्कृत की दूरी बनी रही। संस्कृत में रचने के कारण आधुनिक इतिहासकार विद्यापति को समझने में सक्षम नहीं थे। विद्यापति एक ऐसे क्षेत्र से भी आते थे जिसका दिल्ली सल्तनत या किसी और बड़े राज्य के बनने-बिगड़ने में कोई विशेष भूमिका भी नहीं थी। हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा गया तो वीरगाथा काल, भक्तिकाल और रीतिकाल के खांचे से भी रामचंद्र शुक्ल ने विद्यापति को बाहर कर दिया। उनके साथ साथ फ़ारसी के विद्वान अमीर ख़ुसरो भी बाहर हो गए।
यह लेख विद्यापति पर है मगर मध्यकालीन इतिहास लेखन की जड़ता को भी तोड़ता। दिल्ली सल्तनत और मुग़लों का इतिहास आज की शब्दावली में कहें तो एनसीआर का इतिहास है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का। यही कारण है कि इस इलाके की तमाम विविधताएं अब जड़ लगने लगी हैं क्योंकि उनसे जितना राजनीतिक सांस्कृतिक रस निचोड़ा जाना था, निचोड़ लिया गया है। पंकज पंद्रहवीं सदी में फ़ारसी और संस्कृत का बड़ा ही दिलचस्प खाका खींचते हैं।
कीर्तिलता ग्रंथ में विद्यापति कहते हैं कि संस्कृत सिर्फ बुद्धीजीवियों को भाती है। दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ शाही कामकाज़ फ़ारसी में होने लगता है। पंकज ने शाही कामकाज़ की जगह सरकारी कामकाज़ लिखा है! “ लेकिन हम अक्सर भूल जाते हैं कि वो अफ़ग़ान, तुर्की, हब्शी, ताजिक व मध्य एशियाई लोग, जिनकी भागीदारी से सल्तनत की स्थापना हुई और जिनके हाथ में शासन की बागडोर थी, उनमें विविध भाषा-भाषी समूह मौजूद थे। इनमें से बहुत कम लोग फ़ारसी लिख-पढ़ या बोल सकते थे। तात्पर्य यह है कि अगर नये शासकीय लोगों के संस्कृतपरायी थी तो फ़ारसी से भी उन्हें कोई व्यक्तिगत लगाव नहीं था।“ अब समझ आ गया कि सत्ता को हमेशा लोक-भाषा के ख़िलाफ़ जाकर एक दूसरी भाषा की ज़रूरत क्यों पड़ती है। फ़ारसी, संस्कृत के बाद अंग्रेज़ी आ गई। अगर यह बात समझ नहीं आई तो सलमान की फिल्म का वो गाना सुनिये। बेबी को बेस पसंद है।
प्रतिमान का यह अंक मज़ेदार है। आम पाठकों को महिषासुर से परिचय कराता है जिस संजय जोठे ने लिखा है और इसके बाद भी अभी तक प्रतिमान प्रतिबंधित नहीं हुआ है और न ही संसद में बहस हुई है। स्मृति ईरानी का पढ़ने-लिखने वाला मंत्रालय भी बदल गया है। वैसे जूट उद्योग के समाप्त होने पर भी बेहतरीन लेख है। पंकज के लेख के बाद शिवानी कपूर का इत्र बनाम चमड़ा पढ़ने लायक है। गंध दुर्गंध की राजनीति को शिवानी ने आम पाठकों के लिए आसान शब्दों में उकेरा है। गंध एक राजनीतिक अवधारणा है। दूसरे विश्व युद्ध में फ़ासीवादी जर्मनी के यातना शिविरों की पहली ख़बर वहां निकल रही जलते शवों की बदबू ने ही दी थी। वक्त मिलता तो शिवानी कपूर के लेख की अलग से समीक्षा पेश करता। चमड़े और इत्र के कारोबार से जुड़े गंध को लेकर ज़बरदस्त काम है। हम सब जो रोज़ डियो मारकर दफ्तर चल देते हैं,उनकी नाक इस लेख के बाद कुछ और सूंघने लगेगी। हिलाल अहमद ने प्रोफेसर रंधीर को ख़ूब याद किया है।
“तब शायद वे सोचेंगे कि ज्ञान की समकालीन राजनीति द्वारा आरोपित सीमाओं ने हमारा क्या हश्र किया है,और आधुनिक विचार को अपनी ज़मीन पर संसाधित करते हुए हम भारतीय बुद्धि की कैसी-कैसी अहम उपलब्धियों का लाभ उठाने से वंचित रह गए हैं।“
ओह नो!मौलिक होने की तड़प ग़ैर संघी खेमे में भी है। लगता था कि भारतीय चिंतन के सवाल पर संघ का ही एकाधिकार है। वैसे demonetization भी भारतीय सोच है। गुप्त काल में जब सिक्कों की कमी हुई तो राज्य सत्ता के अधिकारियों को नगदी वेतन की जगह ज़मीन के टुकड़े दिये जाने लगे और भारत में सामंतवाद आया। ज़मीन के टुकड़े में वेतन तो कैशलेस के समान था मगर सामंतों ने ग़रीबों से जो वसूला उससे उबरने में अभी तक बजट का इंतज़ार हो रहा है। सामंतवाद के पहिये के नीचे वही ग़रीब कुचला गया जिसे आज मुक्त कराने की बात हो रही है।मार्कसवादी इतिहासकार रामशरण शर्मा की इस थ्योरी को कभी नहीं मानना चाहिए वो भी इस सरकार में तो हर्गिज़ नहीं। थोड़ा प्रो गर्वमेंट होना चाहिए! कालक्रम में कई राजाओं ने,जिनमें से कई सनकी भी थे,अपने सिक्के चलवाये।नए सिक्के आए होंगे तो पुराने वाले बंद ही हुए होंगे।
अब उपनिवेशवादी सोच का क्या होगा,इतना लोड नहीं लेता।नवउदारवादी विचारधारा को राष्ट्रवादी बताने वाले केमिस्ट्री में प्रथम श्रेणी से पास आज के नेता भी इस सोच पर हमला कर रहे हैं और दूसरी तरफ से ‘ग़ैर संघी भारतीय इतिहासकार’ भी। आपने देखा सरकारों के साथ ‘नोमिनक्लेचर’यानी नामावली कैसे बदलती है। ग़ैर संघी भारतीय इतिहासकार! वैसे प्रतिमान के इस अंक में भारत और भारतीयता पर भी एक गंभीर लेख है। कैशलेस होकर हम राष्ट्रवादी बनेंगे और अमरीकी वीज़ा और मास्टर कार्ड को सर्विस चार्ज देंगे। हम किसी का अहसान नहीं रखते। हम प्रतिमान पढ़ते हैं। जिस टिप्पणी पर हमने टिप्पणी की वो प्रतिमान के संपादक अभय कुमार दुबे की प्रतीत होती है। दुबे, तिवारी, चौबे, मिश्र, झा, कपूर से भरपूर यह अंक आगे चलकर ख़ास किस्म के पाठ की सामग्री बनेगा। यह मेरा विश्वास है!
हिन्दी के पाठकों को प्रतिमान का अंक गर्व के साथ अपने पास रखना चाहिए। कभी कभी शो ऑफ भी करना चाहिए। थैले से बाहर हाथ में लेकर चल सकते हैं। सिर्फ पढ़ना ज़रूरी नहीं है,आप पढ़ते हैं इसका भाव बाहर भी झलकना चाहिए। टी शर्ट के साथ इस आदत को डिस्प्ले कीजिए। हिन्दी वाला डूड बनिये लेकिन पहले प्रतिमान पढ़कर कूल तो बनिये। विश्व पुस्तक मेले में हॉल नंबर 12 में वाणी का स्टॉल है। वहां से ले लीजिएगा।

Friday, January 6, 2017

त्रि-भाषा फॉर्मूला


हिंदुस्तान की अनेकता में एकता की जिस खुशबू व रंगारंग विरासत पर दुनिया नाज करती है, उसमें यहां बोली जाने वाली भाषाओं की भी बहुत बड़ी भूमिका है। हर चंद मील के फासले पर जबान और बोलियां बदल जाती हैं। इनको सहेजने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए जरूरी है कि उनका उचित प्रचार-प्रसार हो। ऐसे में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा दसवीं कक्षा तक त्रिभाषा फामरूला लागू किए जाने का फैसला नि:संदेह स्वागतयोग्य है। इससे हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का शिक्षा के रूप में अवसर मिलेगा।इससे बोर्ड से सम्बद्ध 18 हजार स्कूलों में अब दसवीं क्लास तक हिंदी और अंग्रेजी के अलावा एक अन्य भारतीय भाषा को पढ़ाया जा सकेगा। छात्रों के पास इस तीसरी भाषा के तौर पर भारतीय संविधान की आठवीं सूची में सूचीबद्ध भाषाओं में से किसी एक को चुनने का विकल्प होगा। काबिलेगौर है कि इसमें फिलहाल असमिया, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, कन्नड़, मलयालम, मराठी, उड़िया, कश्मीरी, संस्कृत, तेलुगू, मैथिली और उर्दू समेत 22 ऐसी भारतीय भाषाओं को सूचीबद्ध किया गया है, जो विभिन्न राज्यों के लोगों द्वारा बोली जाती हैं। इसके दो फायदे हैं। अव्वल तो हिंदी भाषी राज्यों के छात्रों को अपने ही देश की एक अन्य भाषा का ज्ञान होगा।
दूसरे, उन राज्यों में जहां हिंदी नहीं बोली जाती है, उन्हें अंग्रेजी और अपनी इलाकाई जबान के इलावा हिंदी को सीखने का मौका मिलेगा। इसे हम महज भाषाई नहीं बल्कि संस्कृतियों के आदान-प्रदान के रूप में देख सकते हैं; क्योंकि भाषा से सिर्फ उसकी लिपि या फिर बोली ही नहीं, बल्कि उसमें मौजूद साहित्यक, सांस्कृतिक और सामाजिक खजाने का भी बोध होता है। सीबीएसई से सम्बद्ध हजारों स्कूलों में लगभग ढाई करोड़ छात्र पढ़ते हैं। ऐसे में इन छात्रों को अपनी धनवान भारतीय भाषाई विरासत का ज्ञान होगा। वैसे भी भाषा, साहित्य और सांस्कृतियों को लोगों को जोड़ने और करीब लाने में मददगार होता है। ऐसे में ये कहना बेजा नहीं होगा कि इससे हमारी एकता को एक धागे में पिरोने और साम्प्रदायिक सौहार्द की डोर को मजबूत करने में मदद मिलेगी। हालांकि सीबीएसई के इस फैसले से अधिकतर निजी स्कूल खुश नहीं है। दरअसल, इन स्कूलों में तीसरी भाषा के तौर पर विदेशी भाषा को पढ़ाया जाता है। दो साल पूर्व इसी तरह का विवाद तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के जरिए केंद्रीय विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली जर्मन भाषा को खत्म किए जाने को लेकर उठा था।
उस समय केंद्रीय विद्यालयों को जर्मन की जगह संस्कृत अथवा कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा को पढ़ाने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि उनका फैसला अमल में नहीं आ सका। त्रिभाषा फामरूले पर निजी स्कूलों के विरोध के पीछे ये दलील दी जा रही है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में अंग्रेजी और हिंदी के अतिरिक्त तीसरी आधुनिक भारतीय भाषा को पढ़ाए जाने का फैसला उचित नहीं है। उनका कहना है कि अगर कोई छात्र विदेशी भाषा सीखना चाहता है और उसमें आगे अपना भविष्य बनाने का इच्छुक है, तो उसे इससे वंचित नहीं किया जाना चाहिए। देखा जाए तो निजी स्कूलों के इस विरोध में दम नहीं है; क्योंकि सीबीएसई ने विदेशी भाषा के विकल्प को पूरी तरह से खत्म नहीं किया है और इसे चौथी भाषा के रूप में चुनने की छूट दी है। वैसे भी हमारी नई पौध को भारत की मालामाल विरासत में विशेष महत्व रखने वालींिहंदुस्तानी भाषाओं का ज्ञानबोध कराना ज्यादा आवश्यक है।
गौरतलब है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति और एनसीआरटी के राष्ट्रीय पाठक्रम फ्रेमवर्क में त्रिभाषा फामरूले को माध्यमिक शिक्षा के स्तर तक क्रियान्वित किए जाने का स्पष्ट उल्लेख है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के द्वारा दसवीं तक तीन भाषाओं को पढ़ाए जाने का फैसला इस फ्रेमवर्क के अनुकूल है। ऐसे में निजी स्कूलों को भी अब इस त्रिभाषा फामरूले का अनुपालन करना अनिवार्य होगा। हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि दसवीं के बोर्ड इम्तेहान में इस तीसरी भाषा के अंक जुड़ेंगे या नहीं, फिर भी इसके दूरगामी परिणामों की अनदेखी नहीं की जा सकती है। इससे सीबीएसई से सम्बद्ध हजारों स्कूलों में ऐसे अध्यापकों की आवयकता होगी, जो इन आधुनिक भारतीय भाषाओं का ज्ञान रखते हों। यही नहीं इन क्षेत्रीय भाषाओं के ज्ञान से छात्रों को भी अनुवादक जैसे पदों पर नियुक्तियों के अवसर प्रदान होंगे। इस तरह सीबीएसई के इस फैसले से बहुत सी नौकरियों के सृजन होने की भी उम्मीद है।

women security issue

उन परिवारों में भी, जहां औरतों के लिए तमाम पाबंदियां हैं, पुरु षों की उद्दंडता पर कोई लगाम नहीं है। लड़कियां बाहर निकल रही हैं। उच्च शिक्षा लेकर, बेहतर जीवन चुन रही हैं। बावजूद इसके खांटी रूढ़िवादी सोच वाले पुरु षों का समूह हमेशा इस ताक में फिरता है, कि वह स्त्री की देह को अपना शिकार बना ले। इस तरह के सोच वाले पुरु षों को स्त्री की यह तरक्की आंख की किरकिरी लगती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह जश्न नव वर्ष का न होकर होली या किसी आम मेले का होता तो भी स्त्री के साथ हील-हुज्जत करने वालों का हुजूम मौजूद रहता। औरतों के साथ सलीके से पेश आने का शऊर अभी भी पुरु षों में कम ही दिखता है। जो पुरु ष इस तरह की अभद्रता नहीं कर पाते हैं, उनकी भाषा और बोल-चाल में स्त्री के प्रति अश्लीलता व निर्लज्जता साफ देखी जा सकती है।
माननीय तो हमेशा की तरह, रटी-रटाई दुहाई देकर चलते बने। अपनी दिमागी क्षमता भर का गहन विश्लेषण करने के बाद उन्होंने दोहराया, यह सब पश्चिमी पोशाकें पहनने के कारण हुआ। यह जो भीतर से निकला हुआ, शुद्ध पुरु षवादी विचार है; इस पर रोक कैसे संभव है? शायद ही कोई औरत भूली होगी, उप्र के बुजुर्ग नेता का बलात्कार पर दिया गया उदगार-कि लड़कों से ऐसी गलतियां हो जाती हैं। कुछेक साल पहले, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री ने तुनक कर मीडिया से कहा था, इतनी रात में निकलेंगी बाहर (लड़कियां) तो यही होगा। सत्ता के शीर्ष पर बैठे नुमाइंदों की बयानबाजी बताती है, स्त्री को लेकर इनकी सोच कितनी निचले पायदान पर ठहरी हुई है। छेड़छाड़, छींटाकशी, अश्लील इशारेबाजी के खिलाफ तमाम नियम/कानून बन जाने के बावजूद पुरु षों में सलीका नहीं आया है।
शहरों को स्मार्ट बनाने भर से या हर हाथ में मोबाइल सेट पहुंच जाने से दिमागी संकीर्णताएं व रूढ़िवादी संस्कारों को नहीं बदला जा सकता। उत्सव-आनन्द पुरु षों के लिए आरक्षित नहीं किए जा सकते। इस तरह की कोई भी घटना लड़कियों को मानसिक तनाव देती है और उनके स्वाभिमान को चोटिल भी करती है। आप उन्हें कुछ दें भले ही ना, पर जो उनके पास है, जो उनका अधिकार है, उस पर अपनी गंदी नजर न डालें।

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